फिर उभरी जाति….

फिर उभरी जाति….

जाति की राजनीति और राजनीति की जाति। इन दोनों के बीच बीते चार साल के दौरान बड़े व्यापक पैमाने पर रद्दोबदल देखे गये। वर्ष 2014 जातियों की दीवारें टूटने का साल था,  वहीं साल 2018 जातियों की टूट चुकी दीवार के फिर से खड़े हो जाने का साल है। पर, हैरतअंगेज यह है कि जातियों के खांचे को तोड़ने और फिर से खड़े करने का श्रेय नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी को ही जा रहा है।

वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी उम्मीदों की लहरों पर सवार होकर गुजरात की सीमा से निकल देश के सियासी फलक पर छाने की कोशिश कर रहे थे। तब जातियों में बंटी भारतीय राजनीति की सारी बंदिशें बिखर गयीं। क्योंकि गोधरा और अहमदाबाद, टोपी न पहनने, तुष्टीकरण न करने सरीखी घटनाओं ने मोदी को जाति का नहीं हिंदूओं का नेता बना दिया था। लेकिन वह हिंदू नहीं जो विश्व हिंदू परिषद की लकीर पीटता हो, जो हिंदुत्व की पुराना मान्यताओं को पकड़कर बैठ गया हो बल्कि वह हिंदूत्व जिसमें विकास के कीर्तिमान थे, जिसमें गुजरात को कई क्षेत्रों में अप्रतिम बना देने का प्रमाण था। जिसमें अपने काम, परिश्रम और ईमानदारी के बूते सुशासन देने का इतिहास था। जिसमें उम्मीदें थीं, संभावनाएं थी, संकल्प था, सपना था, सपने को पूरा करने की वचनबद्धता थी। तभी तो अपने स्वर्णिम कालखंड में तकरीबन 23 से 25 फीसदी वोटों के बीच झूलने वाली भाजपा को 31 फीसदी से अधिक वोट दिलवाने में उन्होंने कामयाबी हासिल कर ली। पहली बार भाजपा सचमुच राष्ट्रीय पार्टी हुई। अपने बलबूते सरकार बनाने का जादुई आंकडा इकट्ठा करने से आगे निकल गयी।

देश के निर्वाचन इतिहास में इससे अधिक वोट पाने का कीर्तिमान 1984 में राजीव गांधी के नाम है, उन्हें इंदिरा गांधी की मौत की सहानुभूति के चलते 49 फीसदी वोट और 404 सीटें हासिल हुई थीं। पहली मर्तबा 1977 में कोई पार्टी 50 फीसदी से अधिक वोट पाने में कामयाब हुई थी। 1977 में जनता पार्टी  को 51.89 फीसदी वोट मिले थे। उनके हाथ 343 सीटें लगीं थीं। हालांकि इसी चुनाव में इंदिरा गांधी को 40.98 फीसदी वोट और 189 सीटें मिली थीं। लेकिन नरेंद्र मोदी ने इन सबसे इतर और बड़ा इतिहास रचा था क्योंकि उनके सामने खड़ी कांग्रेस पार्टी को सिर्फ 19.52 फीसदी वोट मिले और उसे 44 सीटों पर संतोष करना पड़ा।

1984,1977 या 2014  कोई कालखंड हो इतने फीसदी वोट सिर्फ कास्ट केमिस्ट्री से इकट्ठा नहीं किए जा सकते हैं। उत्तर प्रदेश की नज़ीर लें तो 2007 में बसपा की मायावती को 30 फीसदी से अधिक वोट मिले थे और उन्होंने स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाई थी। कुछ इसी तरह का इतिहास समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने दोहराया उन्हें 29.15 फीसदी वोट मिले। ये दोनों कालखंड ऐसे थे जब इनको अपनी जातियों के अलावा भी सभी जातियों से कम या ज्यादा वोट मिले । कांग्रेस पार्टी की सफलता का आधार भी यही रहा कि वह हर जाति और संप्रदाय से कुछ न कुछ वोट अपने लिए जुटा ही लेती है। नरेंद्र मोदी ने भी साल 2014 में यही किया था।

भारतीय राजनीति में वोटबैंक कि स्थापना पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उस समय की जब अमरोहा से संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार आचार्य जे बी कृपलानी बने। आचार्य कृपलानी को हराने के लिए पंडित नेहरू ने पार्टी की जिला ईकाई से लेकर केंद्रीय नेतृत्व द्वारा जिस रामशरण के नाम का अनुमोदन हुआ था उसे बदल कर अपने कैबिनेट ऊर्जा मंत्री को अचानक उम्मीदवार बना दिया। वे अल्पसंख्यक थे, हालांकि वह सफल नहीं हो पाए। वैसे भारत में ‘कास्ट’ शब्द का प्रचलन सबसे पहले पुर्तगाल के यात्रियों द्वारा किया गया था।  पुर्तगाली ‘कास्टा’ शब्द का इस्तेमाल करते थे जिसका स्पैनिश और पुर्तगाली भाषा में मतलब वंश, नस्ल, वंशावली होता है। अंग्रेजों ने इसी से कास्ट शब्द बनाया। कास्ट का अर्थ होता है जाति। भारत में जाति प्रथा तो बहुत साल से प्रचलित है वर्तमान में भारत में 3000 से ज्यादा जातियां और 25 हजार से ज्यादा उपजातियां विद्यमान हैं।

क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपनी सियासत इन्हीं जातियों के बलबूते चमकायी है। हर जाति के नेता उस जाति के सघन रिहायिशी इलाकों में खड़े किए। इससे उन्हें पूरी जाति-जमात से संपर्क में रहने की जरुरत खत्म हो गयी। जातीय अस्मिता को क्षेत्रीय क्षत्रपों ने इतना गहरा किया कि उनकी जाति का नेता उनके लिए कुछ न करे तो भी पता नहीं किन कारणों से वह जाति गौरव का बोध करती रहती है। हालांकि मुलायम सिंह यादव अकेले इसके अपवाद हैं। उत्तर प्रदेश में सोनेलाल पटेल की अपना दल हो, ओमप्रकाश राजभर की भारतीय समाज पार्टी हो, निषाद पार्टी हो, मौर्य समाज पर आधारित महान दल हो किसी के नेता ने अपनी जाति जमात का कोई फायदा नहीं किया है। जातियों के अलावा राजनेताओं ने वोटबैंक को अगड़ों पिछड़े, अल्पसंख्यक और दलित के खांचे में भी बांटा है। इसमें भी केवल अगड़े, केवल पिछड़े, केवल दलित अथवा केवल मुस्लिम वोट के सहारे बाजी नहीं मारी जा सकती। इन चार में किसी दो  का साथ रहना जीत की उम्मीद जगा सकता है।

अगड़ों में ठाकुर, पिछडों में यादव और दलितों में पासी मार्शल कौम है। जब इन मार्शल कौमों के नेता सत्ता के शिखर पर आते हैं तब इनके रंग-ढंग, चाल-ढाल से प्रतिक्रियाएं भी होती है। नतीजतन, इनकी अगुवाई वाले दल लगातार दूसरी बार सत्ता पाने से वंचित रह जाते हैं। जिस भारतीय जनता पार्टी ने जाति और जमात के सारे बंधन तोड़ दिए थे। उसी को विधानसभा चुनाव में जातियों पर निर्भर होना पड़ा। अब जब 2019 के लोकसभा चुनाव की बारी है तब वह जातियों की दौड़ में क्षेत्रीय क्षत्रपों से पिछडती नज़र आ रही है। इसकी नज़ीर कभी गोरखपुर, कभी फूलपुर और कभी कैराना में दिखती है। कैराना और नूरपुर के चुनाव में संयुक्त विपक्ष के दोनों उम्मीदवार मुस्लिम थे। नतीजतन, भाजपा नेताओं की बाछें खिलीं थीं। लेकिन यहां कि पराजय ने यह बता दिया कि वह बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक की लड़ाई भी हार रही है। जातियों की लड़ाई तो वह क्षेत्रीय क्षत्रपों के चलते जीतने की स्थिति में ही नहीं थी। ऐसे में अगर सियासत की सूरत नहीं बदली और कुछ लीक से हटकर न हुआ तो जहां साल 2014 का चुनाव जातियों के टूटने की कहानी कह गया तो संकेत बता रहे हैं कि साल 2019 कहीं जातियों के उभार का फसांना ना बयां कर जाय।