2019 लोकसभा चुनाव- नरेंद्र मोदी बनाम नरेंद्र मोदी

2019 लोकसभा चुनाव- नरेंद्र मोदी बनाम नरेंद्र मोदी

चार वर्ष का कालखंड किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ा होता है क्योंकि कोई भी सरकार अपने पांचवे वर्ष में चुनाव मूड और मोड में आ जाती है। सरकार का इकबाल कम हो जाता है। हालांकि इन दिनों भारतीय लोकतंत्र में चुनाव सालाना उत्सव हो गये है। हर साल कहीं न कहीं कोई न कोई चुनाव होता ही रहता है। इससे सरकार के दक्षता जरुर प्रभावित होती है पर इकबाल नहीं। लेकिन जिस सरकार का चुनावी साल होता है उसका इकबाल भी प्रभावित होता है। नरेंद्र मोदी सरकार अपने इकबाल प्रभावित होने कालखंड में प्रवेश कर चुकी है।

2014 में जब नरेंद्र मोदी लोगों की उम्मीद का केंद्र बनकर उभरे थे तब देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्सा था। जिसे लोकपाल और लोकायुक्त के बहाने अन्ना हजारे ने जनांदोलन में बदल दिया था। दस साल का मनमोहन सिंह का मौन सालने लगा था। नरेंद्र मोदी उसके बरअक्स खूब बोल रहे थे। वह एक नए भारत के निर्माण का संकल्प दोहरा रहे थे। हालांकि नरेंद्र मोदी सिर्फ विकास की सिसासत के प्रतीक और पर्याय नहीं वे हिंदुत्व की ठोस जमीन पर खड़े होकर देश के राजनीतिक सिद्धांत को बदलने वाले शिल्पकार हैं।

नरेंद्र मोदी के आविर्भाव से राजनीतिक तौर पर यह सिद्धांत मान्य था कि अल्पसंख्यकों के बिना किसी प्रदेश की और देश की सरकार नहीं बन सकती है। ऐसा क्योंकि इनकी तादाद 18 फीसदी के आसपास बैठती है। पर इसे खारिज करते हुए नरेंद्र मोदी ने एक नये सिद्धांत के प्रतिपादन की भीष्म प्रतिज्ञा की जिसमें उन्हें यह साबित करना था कि केवल बहुसंख्यक आबादी स्पष्ट बहुमत की सरकार बना सकती है। उनका यह साबित करना बहुसंख्यकों सिर्फ विजय नहीं थी लंबे समय से तुष्टीकरण से परेशान लोगों के लिए उम्मीद भी थी पर इसके साथ ही नरेंद्र मोदी रोजगार देने, अर्थव्यवस्था को पटरी लाने, महंगाई बांधने, भ्रष्टाचरा दूर करने सरीखे जो वादे कर रहे थे उस पर यकीन हो रहा था।

आज चार साल बाद जब यही वायदे परखे जा रहे हैं तो भ्रष्टाचार रोकने के मामले में पूरी तरह कामयाब दिख रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत घोटाला विहीन उनकी सरकार है। सरकारी खजाने में 90 हजार करोड़ रुपये उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान के मार्फत जमा कराए।  इस लेकिन महंगाई रोकने और रोजगार देने के मामले में सरकार उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई। हालांकि इसके उन्होंने मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया. स्टार्टअप इंडिया, मुद्रा लोन और स्टैंड अप इंडिया सरीखे कई कार्यक्रम शुरु किए। पर इन कार्यक्रमों की अंतिम परिणिति स्थाई और अपेक्षित रोजगार के तौर पर नहीं हो सकी है। मुद्रा योजना के तहत 12 करोड़ 33 लाख लोगों को 5.67 लाख करोड़ रुपए का ऋण बांटा गया है लेकिन तकरीबन 91 फीसदी ऋण 23 हजार से कम का है।

नरेंद्र मोदी जिस हिंदुत्व की ताकत पर सवार होकर आए थे उसे राज्यों में सरकार बनाने के भाजपाई समीकरण के तहत जातियों के खांचे में इस तरह बांट दिया गया है कि उन्हें अपने हिंदुत्व की समग्र ताकत इकट्ठा करने में खुद 2019 में बड़ी मशक्कत करनी होगी। कच्चे तेलों के दाम ने महंगाई रोकने के उनके दावों पर पलीता लगा दिया है। हालांकि भारत को उभरती वैश्विक शक्ति के तौर पर स्थापित करने में कामयाबी हासिल की है। संवाद  की शैली अपनाई है, जन से मन की बात की है। चुनाव सत्ता प्राप्त करने की कला और उसके बनाए रखने की विधि भी है।

सत्ता प्राप्त करने की कला में मोदी अपनी महारत साबित कर चुके हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को सत्ता बनाए रखने की कला की परीक्षा 2019 में देनी होगी। और उस समय अभी स्थितियां दिख रही हैं उसमें पिछले लोकसभा चुनाव में आक्रामक मोदी और रक्षात्मक सत्ता पक्ष के रिश्ते बिलकुल पलटे हुए दिखेंगे। क्योंकि नरेंद्र मोदी को अपनी राज्य सरकारों के सत्ता विरोधी रुझानों का भी नुकसान उठाना होगा। अकेले उत्तर प्रदेश में जो सरकार है, जिस तरह चल रही है, ऐसे ही रहा तो यहीं के नुकसान की भरपाई मुश्किल होगी। सरकार चाहे जो दावा करे पर अकेले गन्ना किसानो का 12402 करोड़ रुपये बकाया है। कैराना का उपचुनाव हिंदुत्व के एजेंडे का लिटमस टेस्ट भी है, भाजपा इसे हार जाती है तो साफ हो जाएगा कि हिंदुत्व जातियों में बंट गया है। बहुत कम वोट से जीतती है तो भी यही साबित होगा। हालांकि उसके जीतने की गुंजाइश विपक्ष ने महज इसलिए बना दी है क्योंकि कैराना और नूरपुर दोनों सीटों पर विपक्ष ने मुस्लिम उम्मीदवार उतार दिया है। नरेंद्र मोदी की पिच पर नरेंद्र मोदी को हरा पाना बहुत टेढी खीर है, यह कांग्रेस, समूचा विपक्षा, मीडिया का बहुत बड़ा तबका, तमाम प्रगतिशील ताकतें और स्वयंसेवी संगठन के लोग गुजरात मे देख और भुगत चुके हैं।

हिंदुत्व मोदी का एजेंडा है। इसीलिए यह अटकलें तैरती हैं इस बार राम मंदिर का निर्माण मोदी की नैय्या पार लगायेगा पर सिर्फ निर्माण से काम नहीं चलने वाला इसके लिए विजेता का भाव भी जरुरी है जिसका निर्माण करने में मोदी कुशल हैं। अयुष्मान भारत, स्वच्छता मिशन, नमामि गंगे, जनधन योजना, उज्जवला योजना, मुद्रा योजना के मार्फत नरेंद्र मोदी की सरकार तकरीबन 30 करोड़ लोगों सीधे तौर पर उपकृत या लाभान्वित करने मे कामयाब हुई है। 31 करोड़ बैंक खाते, साढ़े सात करोड़ शौचालय, साढ़े तीन करोड़ उज्जवला के तहत गैस उनकी सरकार ने बांटे हैं। पर यह दुर्भाग्य है कि नीति और नीयति ठीक होने के बाद भी इन योजनाओँ को जमीन पर उतारने में उनकी ही राज्य सरकारों ने पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नरेंद्र मोदी देश के 68 फीसदी लोगों और 77 फीसदी भौगोलिक क्षेत्र के लिए सर्वमान्य नेता हैं। यह उनकी साख ही है कि नोटबंदी और जीएसटी के बाद भी जनता ने उनसे कभी मुंह नहीं फेरा। 2019 के चुनाव में नरेंद्र मोदी की यही साख दांव पर होगी। पर नरेंद्र मोदी विपक्ष से लड़ने मे कामयाब हैं यह साबित हो चुका है। लेकिन साल 2019  के चुनाव में नरेंद्र मोदी को नरेंद्र मोदी से ही लड़ना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 की उम्मीदों पर सवाल नरेंद्र मोदी से लड़ना होगा और इस लडाई में उनकी ही राज्य सराकर उनका पैर खींचते उन्हें मिलेंगी।