रन, स्कोर व रिकार्ड जिसे संतुष्ट न कर सके वह हैं अमित शाह

रन, स्कोर व रिकार्ड जिसे संतुष्ट न कर सके वह हैं अमित शाह

जाहिरा तौर पर विपक्ष दूसरी बार मोदी सरकार बनने के बाद इस निश्चय पर पहुंच गया होगा कि यह भारतीय जनता पार्टी का स्वर्णकाल है। हो भी क्यों नहीं, क्योंकि अपने बलबूते पर दो बार केंद्र में स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कांग्रेस मुक्त भारत के सपनों को जमीन पर उतारने में भाजपा कामयाब हुई है। हिन्दी पट्टी की इस पार्टी ने पूर्वोत्तर में अपनी धमक दर्ज करायी है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक सरकार बनाकर दिखायी है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम, कोई ऐसा इलाका नहीं है जहां भगवा परचम लहरा न रहा हो। बंगाल में चालीस फीसदी वोट हथियाये। चुनाव द्विध्रुवीय करने में कामयाब हुए। उड़ीसा में पार्टी एक से आठ सांसद तक पहुंच गई। देश में 50 फीसदी वोटों के लक्ष्य के आसपास घूम रही है। पार्टी के विचार पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गृह राज्य में सरकार बनाने की उम्मीदें परवान चढ़ रही हों। जहां वह कालकवलित हुए थे उसी जम्मू कश्मीर में बेमेल गठजोड़ से ही सही सरकार बनाने का सपना सच कर दिखाया हो। लेकिन पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह इस स्वर्णकाल में भी एक ऐसे खब्बू बैट्समैन की भूमिका में नजर आते हैं, जिसे अपने रन, स्कोर और रिकार्ड हमेशा असंतुष्ट रखते हैं। शायद यही वजह है कि अमित शाह हर बार अपने और पार्टी के लिए नया और बड़ा टारगेट खुद ओढ़ लेते हैं। हाल फिलहाल इन्होंने 15 फीसदी सदस्य और बनाने का लक्ष्य ले लिया है। अभी पार्टी के 2.20 करोड़ सदस्य हैं।

वीर सावरकर आदि शंकराचार्य और चाणक्य से अपार प्रेरणा पाने का दावा करने वाले अमित शाह को चुनाव दर चुनाव सफलताओं ने आधुनिक चाणक्य के रूप में भी स्थापित किया है। कभी भाजपा में गुजरात से गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और उत्तर प्रदेश से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी आते थे। इस बार भी मोदी सरकार इसी इतिहास को दोहरा रही है। उस समय आडवाणी ने पार्टी को दो से 182 तक की यात्रा करायी थी, आज पार्टी 303 के साथ खड़ी है। निसंदेह कह सकते हैं कि अमित शाह के कालखंड में पार्टी की यात्रा ज्यादा रोचक और आकर्षक है। मोदी का नाम है, तो अमित शाह का काम। सरकार की योजनाओं को जमीन पर उतारने का ही नहीं बल्कि उसके लाभार्थियों से रिश्ता बनाकर उन्हें वोट बैंक में तब्दील करने का हुनर अमित शाह में ही है। वह उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के गठबंधन और उसके अंकगणित से नहीं डरते हैं। ममता बनर्जी की भभकियों में नहीं आते हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना व भाजपा के बीच बंटे हुए कॉडर को एनडीए के कॉडर में तब्दील करने से नहीं चूकते हैं। राज्य सरकारों के सत्ता विरोधी रुझानों का लाभ विपक्ष को नहीं उठाने देते। वो राष्ट्रवादी सोच को संतुलन और व्यवहारिकता से इस तरह से तब्दील करते हैं कि समूचा चुनाव सरकार के कामकाज की जगह राष्ट्रवाद पर लड़ लिया जाता है। अध्यक्ष के रूप में उन्होंने चुनाव जीतने वाली ताकत के रूप में पार्टी का शानदार प्रदर्शन किया। अगर नरेंद्र मोदी को दिमाग मान सकते हैं तो अमित शाह की भूमिका उन मांसपेशियों की हैं जो उनके विचारों को जमीन पर उतार देते हैं।

गुजरात के मनसा में प्लास्टिक पाइप बनाने वाली कंपनी का व्यापार सम्हालने वाले अमित शाह ने अहमदाबाद से बायोकैमेस्ट्री की पढ़ाई की है। इसी वजह से वह राजनीतिक गणित पर यकीन नहीं करते। 1983 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अपने कॅरियर की शुरुआत करने वाले अमित शाह ने 1997 में सरखेज से मोदी की सलाह पर चुनाव लड़ा। मोदी से उनकी पहली मुलाकात 1982 में हुई थी। उन्होंने नरेंद्र मोदी से एक साल पहले यानी 1986 में भाजपा को ज्वाइन किया। अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोआपरेटिव बैंक के अध्यक्ष रहे। 1991 में लालकृष्ण आडवाणी व 1996 में अटलजी के गांधीनगर से चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी उनके पास थी।

गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन का नियंत्रण कांग्रेस नेता नरहरि अमीन से लेकर नरेंद्र मोदी के हवाले कर दिया। अमित शाह गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के वाइस प्रेसीडेंट थे। 2014 में नरेंद्र मोदी के पद छोड़ने पर प्रेसीडेंट बन गए। अभी तक शाह ने छोटे बड़े मिलाकर 29 चुनाव लड़े हैं लेकिन एक में भी उन्हें हार का सामना नहीं करना पड़ा। वह नरेंद्र मोदी सरकार में गुजरात में सबसे कम उम्र के गृह मंत्री थे। वे शह देना पसंद नहीं करते वह मात देते हैं या उस आदमी को अपने पाले में लाकर खड़ा करते हैं। नीतीश को अपने खेमे में लाकर उन्होंने हारी बाजी जीत में पलट दी।  गोवा में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को पछाड़कर सरकार बनाने में कामयाब रहे। चुनाव में कड़ी मेहनत और जबर्दस्त रणनीति उनकी सफलता का ताना बाना बुनती है। वे कुशल रणनीतिकार व आयोजक हैं तभी तो मोदी के हर लक्ष्य को हासिल कर दिखाते हैं। वे बहुत गहराई से काम करते हैं जहां सेंध लगानी होती है, उसका गहराई से अध्ययन करते हैं, दरार तलाशते हैं और वार करके उसे इतना चौड़ा कर देते हैं कि या तो वह ढह जाए या उनके प्रवेश का मार्ग बन जाए। वे सियासी चक्रव्यूह रचने के माहिर हैं। जमीनी योजनाओं और किसी चीज को विस्तार से जानने की जिज्ञासा उनके लक्ष्य को पाने का आधार होती है हालांकि जब वह लक्ष्य तय करते हैं तो सबके उपहास का पात्र बनते हैं लेकिन हासिल करते ही सबको चकित कर देते हैं वह अपने बास का इशारा समझते हैं।

मोदी को जब प्रधानमंत्री बनने की सुध आयी तो उन्होंने राजनाथ सिंह से कहकर शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी महामंत्री नियुक्त कराया। शाह ने अस्सी में से 71 सीटें जीत कर कमाल कर दिखाया। रणनीति में चूक की जीरो टालरेंस की नीति है उनकी। यह उनकी चतुराई थी कि चुनाव में मोदी के मुकाबले कौन का कालम भरने ही नहीं दिया। जेल और निर्वासन ने शाह को मजबूती प्रदान की। पार्टी के पोस्टरों से नेपथ्य में चले गए प. दीनदयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को फिर जगह दी। बतौर अध्यक्ष मोदी के अश्वमेध का घोड़ा कहीं नहीं रुकने देने का करिश्मा कर दिखाया। वे नरेंद्र मोदी के लिए अपरिहार्य हैं शायद यही वजह है कि पिछली सरकार में एक से सौ तक नरेंद्र मोदी के ही रहने का चलन तोड़ कर अमित शाह को नंबर दो बनाकर दिखाया है। गृहमंत्री के रूप में उनकी नये ढंग की चुनौतियां हैं। लेकिन पार्टी की विजय गाथा जारी रखते हुए अध्यक्ष के लिए उन्होंने बड़ी चुनौती पेश कर दी। इसीलिए भले पार्टी का संविधान बदलना पड़ा, केरल व पश्चिम बंगाल में भगवा फहराए जाने तक अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनाए रखना अपरिहार्य हो गया है। भाजपा घोषणा पत्र में अनुच्छेद 370 व अनुच्छेद 35 को निरस्त करने का वादा है। पूर्वोत्तर में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर लागू करने का काम है। अयोध्या में राम मंदिर की गुत्थी सुलझाने की जिम्मेदारी है। नक्सली समस्या को खत्म करने का कठिन लक्ष्य है। वे मोदी के भरोसे पर खरे उतर चुके हैं, उन्हें अब जनता के भरोसे पर खरा उतरना होगा। शाह ने दूध डेयरियों को भी पार्टी के करीब लाए जिससे गुजरात में एक तिहाई मतदाताओं का आधार जुड़ता है। गुजरात में गृहमंत्री रहते हुए अहमदाबाद बम विस्फोट के जिम्मेदार आतंकियो को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से पकड़वा कर उन्होने आतंकवादियों के खिलाफ अपने स्टैंड का जो परिचय दिया था उसे आज पूरा देश महसूस कर रहा है। आज जब मोदी आतंकवाद के खिलाफ पूरे विश्व का चेहरा बन रहे हों तब अमित शाह के हाथ आतंकवादियों से लड़ने की कमान का होना लाजमी है क्योंकि दोनो एक दूसरे के पूरक ही नहीं पर्याय हैं।