ये मेरे वतन के लोगों

ये मेरे वतन के लोगों

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले के अवंतीपुरा के लेकपुरा इलाके से गुजर रहे सीआरपीएफ के काफिले पर हमला करके 40 जवानों की नृशंस हत्या करने की जैश-ए-मोहम्मद के कायराना हरकत से पूरा देश स्तब्ध है, गुस्से में है। उसका यह गुस्सा कहीं धरना, कहीं प्रदर्शन, कहीं पाकिस्तान मुर्दाबाद, कहीं कैंडिल मार्च, कहीं बाजार बंद, कहीं दो मिनट का मौन रख कर श्रद्धांजलि देने और कहीं पाकिस्तान से दो-दो हाथ करने के संदेश में पढ़ा जा सकता है। सोशल मीडिया पर इस हमले के बाद केंद्र सरकार क्या-क्या करे इसकी तमाम नसीहतें बिखरी पड़ी हैं। 370 खत्म किया जाए। भारत सिंधु समझौता तोड़े। पाकिस्तान को पानी देना बंद करे। अब सर्जिकल स्ट्राइक से काम नहीं चलेगा। जितने मुंह उतनी राय, इतनी कि दिमाग चक्कर खा जाये। हर तरफ शहीदों को श्रद्धांजलि दी जा रही है। वीर जवानों के शव उनके शहर-गांव पहुंचने पर भव्य अगवानी की गई। ये एक अच्छा संदेश है। अच्छा संकेत है। बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कहा कि “मैं महसूस कर रहा हूं कि देशवासियों के दिलों में कितनी आग है, जो आग आपके दिल में है, वही आग मेरे दिल में है”

देश के लोगों के मन में जो गुस्सा है उसके प्रति मैं भी श्रद्धानत हूं। 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हमले के समय जब हमारे नौ सुरक्षा कर्मियों ने शहादत दी थी उस घटना के दिन मैं और मेरे पत्रकार साथी संजय सिंह संसद को कवर करने के लिए गेट में घुसने ही वाले थे। अचानक हम लोगों को भागकर पड़ोस के ट्रांसपोर्ट भवन में घुसना पड़ा। इस हमले का मास्टमाइंड जैश का अफजल गुरु था। 10 फरवरी, 2013 को 13 साल बाद जब अफजल गुरु की फांसी हुई तब हमारे तमाम लोकतांत्रिक साथियों ने इसका भी विरोध किया। हालांकि जब संसद पर हमला हुआ था, तब माहौल जनता के बीच आज जैसा ही था। मुंबई हमले के बाद भी जनता ने जिस राष्ट्रवाद और राष्ट्र प्रेम का परिचय दिया था वह आज सरीखा ही था। तब भी टीवी चैनलों की बहसों में युद्धोन्माद की स्थिति दिखती थी। लोग पाकिस्तान से दो-दो हाथ करने के संदेश दे रहे थे। तब और अब दोषियों को मुंहतोड़ जवाब देने की मांग जारी है। पर दूसरी ओर करतारपुर साहिब गलियारा खोलने की भी जरूरत जताई जा रही है। हाल फिलहाल तो पक्ष और विपक्ष की भाषा एक है। सबने राष्ट्र के इस गंभीर और संवेदनशील समय में अपने मुंह बंद कर रखे हैं।
लेकिन जिस तरह की अंदरखाने तैयारियां हो रही हैं, जिसकी बानगी सोशल मीडिया पर दिख रही है, हालांकि मैं इसे अनसोशल मीडिया कहता हूं, उससे यह संदेश जुटाना आसान दिखता है कि यह मौन, यह एका बेहद क्षणिक है। क्योंकि कुछ पोस्ट यह कह रही है कि 24 दिसंबर, 1999 को 180 यात्रियों वाले विमान को अपहरण कर कांधार ले जाकर मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक जरगर और शेख अहमद सईद जैसे चरमपंथी आतंकियों को छोड़ना गलती थी। क्योंकि ठीक एक साल बाद फरवरी, 2001 में अजहर ने जैश-ए-मोहम्मद की नींव रखी। पुलवामा हमले का जिम्मेदार आदिल अहमद उर्फ वकास कमांडो इसी तंजीम का था। 2014 में नरेंद्र मोदी के देश की सुरक्षा को लेकर चुनाव के दौरान दिये गए भाषणों के वीडियो भी इस अनसोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। इस पर लिखा-पढ़ा जा सकता है कि राजनीतिक कारणों से भारतीय सेना आधुनिकीकरण में पिछड़ गई है। सीआरपीएफ को भी सेना की तरह ढालने की जरूरत है। भारत को जितना सख्त होना चाहिए वह नहीं हो रहा है। राज्यों ने जिस तरह शहीदों के परिजनों को दी जाने वाली अनुग्रह राशि में अंतर कर रखा है वह भी विवाद का सबब है। एक अंग्रेजी अखबार हमले के मामले में आतंकियों की जगह लोकल यूथ लिखकर इस चरमपंथी घटना को जो ट्विस्ट देने की कोशिश कर रहा है। उससे यह पता चलता है कि किस तरह हमने कितनी जल्दी अपना टोन बदलना शुरू कर दिया है।

मनसा वाचा कर्मणा हमारे में कितना अंतरविरोध है। यह किसी भी बड़ी घटना के कुछ ही दिनों बाद पढ़ा जा सकता है। एक आदमी किसी की हत्या कर देता है तो उसकी फरारी की स्थिति में पुलिस उसके मां, बाप, भाई, बहन और तमाम रिश्तेदारों को इतना प्रताड़ित करती है कि अपराधी को हाजिर ही होना पड़ता है। पर आतंकियों के मामले में यह नहीं होता? जैश जैसे संगठन के चरम आतंकियों के परिजन कश्मीर में सरकारी नौकरी करते हुए राजकोष से धन पाते हैं! आतंकियों के जनाजे में लाखों लोग शामिल होते हैं, वह भी भारत की ही होते हैं! पत्थरबाजों को आतंकवादियों का मददगार नहीं माना जाता? पाकिस्तान के साथ जब भी नरमी बरती गई तब पाकिस्तान ने घात किया है। अटल विहारी वाजपेयी के काल में लाहौर बस सेवा के बाद कारगिल हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ के जन्मदिन पर पहुंचकर जन्मदिन की शुभकामनाएं देकर सद्भाव रिश्ते की जो नींव रखी उसका भी जवाब पाकिस्तान लगातार आतंकी घटनाओं से देता आ रहा है। सरकार ने अलगाववादी नेताओं से सुरक्षा वापस ले ली है। पाकिस्तान का मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा खत्म कर दिया गया है। कई और कदमों पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। लेकिन लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बेजा इस्तेमाल पर रोक लगना भी जरूरी है। यह दुर्भाग्य है कि देशहित के मुद्दों पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के पक्ष अलग-अलग होते हैं! देशहित के मुद्दे तब तक स्थाई हल नहीं पा सकते जब तक कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों हमेशा एक सुर में न बोलें। देशहित के मुद्दों को राजनीति से इतर रखकर न देखा जाए। मैं तीन-चार साल पहले सपरिवार जम्मू कश्मीर की यात्रा पर गया था। मेरे ड्राइवर ने बातचीत में कहा कि वहां की समस्या का समाधान पांच नेताओं को जम्मू कश्मीर से बाहर ले जाकर कहीं बसा दिया जाए तो हो जाएगा। उन्हें जम्मू कश्मीर न आने दिया जाए। उसने मुझे इनमें से तीन नेताओं का घर भी कश्मीर में दिखाया। अनंतनाग से गुजरते हुए उस ड्राइवर ने कहा कि साहब यह मिनी पाकिस्तान है। इस जिले के हर एक तिहाई घर की शादियां पाकिस्तान में होती हैं। इसे रोका जाना चाहिए। ड्राइवर भी मुसलमान ही था। जिसे एक संजीदा चालक समझ रहा था उसे हमारे नेता, हमारी सरकारें इसलिए समझ नहीं पातीं क्योंकि उनके लिए उनके हित, उनकी सरकार देश से ज्यादा बड़े होते हैं। बड़ी कुर्सियों पर छोटे मन के लोग बैठते जा रहे हैं। इन लोगों को मन बड़े करने पड़ेंगे।