भारत रत्नः ऐसा एक इंसान चुनो जिसने पाप न किया हो जो…

भारत रत्नः ऐसा एक इंसान चुनो जिसने पाप न किया हो जो…

दस बच्चों में एक संतोष। गदहा मारे कौन दोष। यह ज्ञान कथा एक पंडितजी अपने कुछ जजमान को तब बता रहे थे जब उन्हें यह इत्तला दी गई कि कुछ बच्चों ने शरारत में एक गधे का वध कर दिया है। उन बच्चों में पुरोहित का बेटा संतोष भी था। लेकिन संतोष का नाम आने के पहले तक पंडितजी गधे के मारे जाने को लेकर पाप और दान की कई कथाएं सुना रहे थे। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान आए भाजपा के घोषणापत्र में विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने के एलान ने कुछ ऐसी ही स्थिति पैदा कर दी है। लग रहा है कि देश के प्रतिष्ठित भारत रत्न सम्मान के साथ पहली बार छेड़छाड़ हो रही है। सावरकर को यह सम्मान देने के प्रस्ताव को गलत ठहरा रहे लोगों को यह याद आना चाहिए कि इस सम्मान को लेकर उंगली कम नहीं उठी है। सबने अपनी राजनीति साधने के लिए इसका इस्तेमाल किया। अब तक भारत रत्न से नवाजे गए जिन भी लोगों को लेकर विवाद उठे हैं, सावरकर के मामले में ऐसा कुछ नहीं है, जो नया हो। अगर यह मान लिया जाए कि भारतीय जनता पार्टी भारत रत्न का उपयोग राजनीति के लिए कर रही है। तो इस सचाई से आँख नहीं मूंदी जा सकती कि ऐसा पहले भी हुआ है। इंदिरा गांधी ने तमिलनाडु के 1977 के चुनाव के मद्देनजर के.कामराज को भारत रत्न दिया था। ठीक दस साल बाद उनके बेटे राजीव गांधी ने एमजी रामचंद्रन को जब भारत रत्न दिया तो उसका भी सियासी लाभ उठाया। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भारत रत्न देकर अपने सियासी समीकरण ही साधे थे। उनकी मंशा उस समय के चुनाव को प्रभावित करने की ही थी।

 

अगर सावरकर के विरोधी यह बताना चाह रहे हों कि वीर सावरकर संघ के प्रतीक पुरुष हैं। भारतीय जनता पार्टी के प्रेरणा पुरुष हैं। भारत रत्न को इतना निजी क्यों किया जाना चाहिए? तो उन लोगों के लिए महज इतना ही कि कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को आनन फानन में भारत रत्न से नवाज दिया। वह भी तब जब केंद्र सरकार के खेल मंत्रालय ने हाकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का नाम भारत रत्न के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा था। यही नहीं, सचिन तेंदुलकर का नाम भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने भी नहीं भेजा था। सचिन तेंदुलकर कांग्रेस द्वारा नामित राज्यसभा सदस्य थे। जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में ही यह सम्मान झटकने में कोई गुरेज नहीं किया था। अगर आलोचक यह कहकर मुंह बंद करना चाहते हैं कि वीर सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगी थी, इसलिए वह भारत रत्न के हकदार नहीं हो सकते। उन्हें भारत रत्न इसलिए नहीं मिलना चाहिए क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश राज से सहयोग का वादा किया था तो आइए इस सच की भी परतें खोलते हैं। 1954 में पहला भारत रत्न चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के हिस्से गया था। माउंटबेटेन के प्रस्थान करने के बाद नेहरू ने उन्हें गवर्नर जनरल नियुक्त कराया। इन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था, जेल से बाहर रहे थे। मोहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान का भौगोलिक खाका पेश किया था। राजगोपालाचारी महात्मा गांधी के समधी थे। जवाहरलाल नेहरू की कोशिश उन्हें भारत का पहला राष्ट्रपति बनाने की थी, पर सरदार पटेल ने राजेंद्र प्रसाद को नियुक्त करा लिया। भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भी मिला है। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान डॉ. अम्बेडकर ब्रिटिश वायसराय की कबीना में मंत्री थे। सीधा सा अर्थ है कि वे आजादी लड़ने वाले लोगों के खिलाफ और साम्राज्यवादियों के साथ थे।

 

अब जंग-ए-आजादी के दौरान सावरकर के कामकाज का मूल्यांकन भी जरूरी हो जाता है। उन्होंने हिन्दू राष्ट्र के विजय के इतिहास को प्रमाणिक ढंग से अपनी किताब ‘इंडियन वार आफ इंडिपेंडेंस- 1857‘ में लिखा है, जिसमें उस समय के इतिहासकारों की इस धारणा को खारिज किया है कि 1857 में सिपाही विद्रोह था। उन्होंने यह स्थापना दी है कि यह ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ स्वतंत्रता की पहली लड़ाई थी। इस किताब को छपवाने के लिए उन्होंने लंदन और पेरिस में संपर्क किया, बाद में किसी तरह हालैंड से यह किताब प्रकाशित हुई। वह मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रहे। उन्होंने ‘हिन्दुत्व-हू इज हिन्दू‘ शीर्षक किताब लिखकर हिन्दुत्व के बारे में अपनी धारणा स्पष्ट की। पांच मौलिक पुस्तकें उनके हिस्से में आती हैं। सेलुलर जेल में बंदी के दौरान उन्होंने बबूल के कांटों और अपने नाखूनों से जेल की दीवारों पर छह हजार कविताएं लिखीं और उन्हें कंठस्थ किया। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सावरकर 1906 से प्रयत्नशील थे। लंदन स्थित भारत भवन में अभिनव भारत के कार्यकर्ता रात में सोने से पहले चार सूत्रीय संकल्प दोहराते थे। इसमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा और देवनागरी को राष्ट्रीय लिपि बनाना भी शामिल था।  सेलुलर जेल में वह नौ वर्ष दस माह रहे। 11 जुलाई, 1911 को अंडमान पहुंचे और 29 अगस्त, 1911 को जेल से ही पहला माफीनामा लिखा। इस माफीनामे में उन्होंने लिखा- ‘‘अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मै यकीन दिलाता हूं कि मै संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा, अंग्रेजी साम्राज्य का वफादार रहूंगा।‘‘

 

सावरकर पर नीलांजल मुखोपाध्याय ने ‘द आरएसएस आइकांस आॅफ द इंडियन राइट‘ नाम की किताब लिखी है। आशुतोष देशमुख ने ‘ब्रेवहार्ट सावरकर‘ लिखा है। निरंजन तकले ने सावरकार पर शोध किया है। वीर सावरकर के कामकाज के तरीकों पर लिखी किताबें यह सचाई सामने रखती हैं कि सावरकर इस माफीनामे को अपनी रणनीति का हिस्सा बताते थे। वह चतुर क्रांतिकारी थे, चाहते थे कि काम करने का जितना मौका मिले, लिया जाना चाहिए। 1920 में सरदार पटेल और बाल गंगाधर तिलक के कहने पर ब्रिटिश कानून न तोड़ने और विद्रोह न करने की शर्त पर उनकी रिहाई हुई। वे रूसी क्रांतिकारियों से प्रभावित थे। पुणे के फर्ग्युसन कालेज में पढ़ाई के दौरान विदेशी वस्त्रों की होली उन्होंने तब जलाई थी, जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का पदार्पण भी नहीं हुआ था। इसी आरोप में उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। बाल गंगाधर तिलक के अनुमोदन पर 1906 में सावरकर को श्यामजी कृष्ण छात्रवृत्ति मिली थी। नासिक के जिला कलेक्टर जैक्सन की हत्या के आरोप में पहले सावरकर के भाई को गिरफ्तार किया गया, फिर आरोप लगा कि हत्या के लिए पिस्टल लंदन से दामोदर सावरकर ने भेजी थी। नतीजतन उनकी गिरफ्तारी हुई और पानी के एसएस मौर्य नामक जहाज से उन्हें भारत लाया जा रहा था, जब वह जहाज फ्रांस के मार्से बंदरगाह के पास पहुंचा तो सावरकर जहाज के शौचालय से समुद्र में कूद गए। वह अच्छे तैराक थे, उनके पीछे सुरक्षाकर्मी भी कूदे। उन पर गोलियां चलाई गईं पर वह बच निकले। सावरकर किसी तरह बच कर किनारे पहुंच गए और भागकर एक पुलिस वाले से कहा- मुझे राजनीतिक शरण के लिए मजिस्ट्रेट के सामने ले चलो। लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें चोर बताकर अपने कब्जे में लेने में कामयाबी हासिल कर ली। वह 25 साल तक अंग्रेजों के कैदी रहे। कालापानी के दौरान सेलुलर जेल में कोठरी नंबर 52 नसीब हुई, जिसका आकार 13.5 गुणा सात दशमलव पांच फीट था। 1958 में राजखोसला निर्मित फिल्म कालापानी सावरकर पर बनी, जिसे दो फिल्म फेयर पुरस्कार मिले। 1996 में मलयाली फिल्म निर्माता प्रियदर्शन ने कालापानी फिल्म बनाई, जिसमें हिन्दी अभिनेता अन्नू कपूर ने सावरकर का रोल किया। वर्ष 2001 में वेदराही और सुधीर फड़के ने वीर सावरकर पर एक बायोपिक बनाई। शैलेंद्र गौड़ इस फिल्म में सावरकर बने हैं।

 

उनके राजनीतिक दर्शन में उपयोगितावाद, तर्कवाद, सकारात्मवाद, मानवतावाद, सार्वभौमिकता, व्यवहारिकता तथा यथार्थवाद के तत्व थे। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के वह सात साल अध्यक्ष रहे। इन्हीं के कार्यकाल में हिन्दू महासभा को राजनीतिक दल घोषित किया गया। 1959 में पुणे विश्वविद्यालय ने उन्हें डीलिट की उपाधि दी। जेल से छूटने के बाद सावरकर ने कभी अंग्रेजों के लिए काम नहीं किया। वह अस्पृश्यता के घोर विरोधी थे। 25 फरवरी 1931 को मुंबई प्रेसीडेंसी में हुए अस्पृश्यता उन्मूलन सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। रत्नागिरी में पतित पावन मंदिर बनवाया था। पतित पावन संगठन की स्थापना भी उन्होंने की थी। अक्टूबर 1906 में लंदन में इंडिया हाउस के कमरे में रात्रिभोज पर सावरकर की मुलाकात मोहनदास करमचंद गांधी से हुई थी। गांधी उस समय भारतीयों के साथ हो रहे अन्याय के प्रति दुनिया का ध्यान आकृष्ट कराने लंदन आए थे। सावरकर से बातचीत में गांधी ने कहा कि अंग्रेजों के खिलाफ आपकी रणनीति ज्यादा आक्रामक है। रात्रिभोज पर दोनो लोगों को बैठना था पर पसंद का खाना न होने के चलते गांधी को भूखे पेट निकलना पड़ा। एक-एक पैसा चंदा जुटाकर सावरकर ने कई स्कूल भी खोले। जो उनके द्वारा एकत्रित चंदे से काफी समय तक चले भी। 2000 में वाजपेयी सरकार ने तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन के पास सावरकर को भारत रत्न देने का प्रस्ताव भेजा था। लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। 26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। ठीक दो दिन बाद सावरकर की 131वीं जयंती थी। संसद भवन जाकर नरेंद्र मोदी ने उनके चित्र के सामने सर झुका श्रद्धांजलि दी। संसद में महात्मा गांधी और वीर सावरकर के चित्र इस तरह लगे हैं कि एक की तरफ मुंह करके खड़े होंगे तो दूसरी तरफ पीठ हो ही जाएगी। यह मुद्रा और इसके व्याख्याकार कहते नहीं थकते हैं कि गांधी और सावरकर एक दूसरे के उलट हैं। गांधी और सावरकर के बीच चेहरे और पीठ का रिश्ता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या में भी सावरकर का नाम आया था हालांकि अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। इस हत्या की जांच पड़ताल के लिए बने आयोग ने सावरकर को दोषी तो नहीं ठहराया पर शक की सुई इस तरह उनके सामने लटका दी कि अपने जीवन के अंतिम दो दशक उन्हें अभिशाप और गुमनामी में गुजारने पड़े। शायद इसी वजह से अस्वस्थ होने पर 1 फरवरी, 1966 को उन्होंने मृत्युपर्यन्त उपवास करने का निर्णय लिया और 26 फरवरी, 1966 को बम्बई में उन्होंने प्राण त्याग दिये। अब तक 48 लोग भारत रत्न हो चुके हैं। इस सम्मान को लेकर जो विवाद उठे हैं, सवाल खड़े हुए हैं, दामोदर सावरकर को भाजपा अगर यह पुरस्कार दे देती है तो ऐसा कुछ न होगा जो पहले न हुआ हो।