सवाल धर्म का नहीं, कर्मकांड का है

सवाल धर्म का नहीं, कर्मकांड का है

पंडित मदन मोहन मालवीय ने जब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की शुरुआत की तो पहला संकाय संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान ही खोला। इसका संकल्प पत्र या संविधान जिसे कह सकते हैं उन्होंने तैयार किया। इसे गैर हिंदू सनातनी के प्रयोग से वर्जित रखा। वर्ष 1918 में इस भवन का शिलान्यास हुआ। पर ऐसा उन्होंने इसलिए नहीं किया कि वह मुसलमानों के विरोधी थे बल्कि वह जानते थे कि जिस संकाय का वह निर्माण कर रहे हैं, उसमें मूर्ति पूजा होगी। श्रावणी कर्म कराने का जिम्मा इनका है। आज मालवीय भवन के संचालन की जिम्मेदारी इसी संकाय के पास है। यहां के अध्यापक को नाट्य शास्त्र भी पढ़ाना हो तो उसमें भी कर्मकांड है। परिसर के अंदर के मंदिर का कामकाज भी यही संकाय देखता है। मोटे तौर पर इस विभाग के अध्यापक को धर्म शिक्षक कह सकते हैं। आजादी की लड़ाई जब चरमोत्कर्ष पर थी तो जो लड़ाई में गहराई से जुड़े थे। उन्हें अहसास हो गया था कि देश आजाद हो जाएगा। 7-8 सौ सालों की गुलामी से आजादी के बाद यह महत्वपूर्ण हो गया था कि आजादी को बचाए रखने में वही व्यक्ति, देश और समाज सक्षम हो सकता है, जो शिक्षा और ज्ञान के लिहाज से संप्रभु हो। इसलिए बीएचयू महज एक विश्वविद्यालय नहीं है। यह मालवीय जी का जीवंत विग्रह है, जिसमें उनके कई सपने, कई संकल्प हैं। इसके निर्माण के लिए उन्होंने बहुत से लोगों से चंदे और दान लिए। सबके अपने-अपने संकल्प और सपने थे। मालवीय जी ने उन्हें सुरक्षित रखने का भरोसा दिलाया था। वहां कई ऐसे छात्रावास हैं जिन्हें बनवाने वालों ने यह शर्त लिख रखी है कि उनके भोजनालयों में मांसाहार नहीं बनेगा। आज भी इसका पालन होता है।

 

वर्ष 2005 में नौ केंद्रीय विश्वविद्यालयों के एक्ट एक साथ केंद्र सरकार ने पास किये। लेकिन बीएचयू समेत सभी शेष अन्य विश्वविद्यालयों के अलग- अलग एक्ट पास हुए हैं। ऐसे में कुलपति और विश्वविद्यालय प्रशासन का यह कहना कि आचार्य फिरोज खान की नियुक्ति नियमानुसार हुई है और कुलपति राकेश भटनागर का फिरोज की नियुक्ति को जायज ठहराना अर्धसत्य है। पिछले कुलपति डॉ. गिरीश त्रिपाठी के समय से ही बीएचयू वामपंथियों और कथित प्रगतिशील ताकतों के निशाने पर आ गया है क्योंकि वहां भारतीय संस्कृति, संस्कार और राष्ट्रीयता की गहरी जड़ें हिलाने की कोशिश हो रही थी। वामपंथियों के षडयंत्र का शिकार गिरीश त्रिपाठी को अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में होना पड़ा जिसे समझने में केंद्र और राज्य सरकार ने गलती की। अभी भी आचार्य फिरोज के मामले को समझने में गलती की जा रही है। सवाल योग्यता का नहीं है। सवाल मुसलमान के संस्कृत भाषा पढ़ाने का भी नहीं है। सवाल अब कुलपति की गलती को बचाने और किसी स्थानीय आदमी के चयनित न हो पाने तक आकर सिमट रहा है, जिसका दंश काशी भुगत रही है।

 

बनारस की आत्मा पर चोट लग रही है। काशी की पांडित्य परंपरा पर सवाल उठ रहे हैं। पूछा जा रहा है कि ज्ञान की धारा और ज्ञान का संदेश देने वाली काशी में यह सब! बताया जा रहा है काशी में बैठकर कबीर ने भेदभाव के खिलाफ संदेश दिया था। काशी में औरंगजेब का भाई दाराशिकोह संस्कृत पढ़ने आया था। गालिब बनारस के लिए चराग-ए-दैर लिख गए हैं, इसे हिंदी में मंदिर का चिराग कहेंगे। काशी में नजीर बनारसी ने गंगा के पानी में वजू करते उम्र गुजारी। बिस्मिल्ला खां ने गंगा को शहनाई सुनाते हुए जिंदगी बसर की। हमारी संस्कृति में मुगलों के दरबारी कवि अब्दुल रहीम खानखाना ने चित्रकूट और राम की महिमा का जो चित्र खींचा है वह दुर्लभ है। सैयद इब्राहिम उर्फ रसखान की कृष्ण भक्ति की भावना जगजाहिर है। ऐसे में फिरोज के संस्कृत पढ़ने और पढ़ाने पर सवाल खड़ा करना जायज नहीं होगा।

 

भाषा जोड़ती है। तोड़ती नहीं। लेकिन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में भाषा को तोड़ने का औजार बना दिया गया है। हालांकि आज तक इस औजार के रूप में जब भी भाषा का इस्तेमाल हुआ है, तब कसौटी पर हिंदी रही है। इस बार इस औजार के रूप में देववाणी संस्कृत का उपयोग किया गया है। विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में डॉ. फिरोज की नियुक्ति ने देववाणी को बांटने के हथियार के रूप में इस्तेमाल होने का कुअवसर दिया। फिरोज ने संस्कृत को पूरी गंभीरता और पारंपरिकता से पढ़ा है। उन्हें संस्कृत के लक्षण ग्रंथ और काव्य प्रकाश कंठस्थ हैं। उन्होंने वेद पढ़ा है। संस्कृत में कविताएं लिखते हैं। बांग्ला के गानों को संस्कृत में दूरदर्शन के लिए गाते हैं। दूरदर्शन पर वार्तावाणी साप्ताहिक कार्यक्रम करते हैं। राजस्थान सरकार उन्हें संस्कृत युवा प्रतिभा पुरस्कार से नवाज चुकी है। फिरोज के पिता रमजान खान ने एक ज्योतिषी के कहने पर अपना नाम मुन्ना मास्टर रख लिया है। वह मंदिरों में भजन गाया करते हैं। कृष्ण भजन गाते कोई उन्हें सुन ले तो कृष्णमय हो जाएगा। रमजान ने शास्त्री तक संस्कृत पढ़ी है। गौशाला चलाते हैं। फिरोज के बाबा गफूर खान संस्कृत के पुजारी और गौ प्रेमी थे। संस्कृत के प्रति आचार्य फिरोज की योग्यता, प्रतिबद्धता, लगाव, समर्पण पर कोई सवाल नहीं उठ सकता है। देव भाषा में निष्णात आचार्य फिरोज का नागरिक सम्मान किया जान चाहिए। भाषा के रूप में संस्कृत की विद्वता में धर्म की कोई भूमिका नहीं हो सकती, मगर जहां तक हिंदू कर्मकांड का सवाल है तो बात कुछ और हो जाती है।

 

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में नियुक्ति के दो दिन के भीतर ही यह सब सवालों के घेरे में आ गया। बीते 5 नवंबर को साक्षात्कार हुआ, 6 को चयन पत्र मिला, 7 नवंबर को ज्वाइन करने गए पर विरोध के बीच। छात्रों के एक समूह ने इस बात पर आपत्ति जताते हुए विरोध शुरू कर दिया कि मुस्लिम अध्यापक संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में क्यों और कैसे पढ़ाएगा? यहां सनातन धर्म के संस्कारों और कर्मकांडों की शिक्षा-दीक्षा दी जाती है। पर छात्रों के विरोध के साथ ही लड़ाई ने वामपंथ और दक्षिणपंथ का रुख कर लिया। लड़ाई संघ के एजेंडे को लागू करने और उसके खिलाफ खड़े होने के बीच आन खड़ी हुई। सवाल धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता के खांचे में फिट किया जाने लगा। कहा जाने लगा पढ़ाई के लिए शिक्षक का जाति और धर्म देखना उचित नहीं है। फिरोज की नियुक्ति संस्कृत साहित्य पढ़ाने के लिए हुई है। उनकी नियुक्ति वेद और कर्मकांड पढ़ाने के लिए नहीं हुई है। यह भी एक कठोर सच्चाई है कि 700 छात्रों वाले इस संकाय में फिरोज का विरोध करने वाले मुट्ठीभर छात्र हैं। संकाय में 20-25 लड़कियां पढ़ती हैं। इनमें से कोई भी आंदोलन का हिस्सा नहीं रहा। यह भी तर्क दिया गया गया कि फिरोज की नियुक्ति चयन समिति के मार्फत हुई है। चयन समिति के लोगों को विश्वविद्यालय के नियम-कानून जरूर पता रहे होंगे। अगर फिरोज जैसे लोग संस्कृत नहीं पढ़ते हैं तो हमारे धर्म के बारे में कैसे दूसरे लोगों को पता चलेगा? कैसे वे हमारे गौरव गान कर पाएंगे? जब हम घर वापसी की बात करते हों तब किसी मुसलमान के संस्कृत पढ़ाने से परहेज हिपोक्रेसी कहा जा सकता है। मैं पिछली सदी में हलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था। वहां डॉ. किश्वर जवीं नसरीन संस्कृत पढ़ाती थीं। उस समय यह सवाल ही जेहन में नहीं आया था- ‘मुसलमान और संस्कृत।‘ आज जब इक्कीसवीं शताब्दी में यह सवाल जेरेबहस है तब कभी-कभी यह लगना स्वाभाविक हो सकता है कि ये कहां आ गए हम? लेकिन इस पूरे वाकये को केवल मुसलमान के संस्कृत पढ़ाने और कुलपति के बयान से अलग रखकर देखने की जरूरत है।

 

सवाल आने वाले दिनों में फिरोज के सामने खड़ी होने वाली मुश्किलों से उन्हें बचाने का भी है। लाहौर के अरबी कॉलेज में मौलवी महेश प्रसाद प्रोफेसर थे। उनके पास मौलवी की डिग्री थी। यानी वह कुरान की शिक्षा दे सकते थे। पर लाहौर में उनसे किसी ने कुरान की तालीम नहीं ली। मालवीय जी ने जब 1920 में बीएचयू शुरू किया तब उन्हें उर्दू, अरबी, फारसी विभाग की जिम्मेदारी दी। कर्मकांड की शिक्षा-दीक्षा के लिए किताबी ज्ञान देने से काम केवल नहीं चलने वाला है। उसके लिए कर्मकांड करवाना भी पड़ सकता है। संगीत का टीचर होने के लिए सिर्फ किताबी ज्ञान जरूरी नहीं है। उसके लिए किसी को वाद्ययंत्र बजाना भी पड़ेगा। जिस संकाय के शिलापट्ट पर लिखा हो कि इस भवन में हिंदू ही आ सकते हैं। वहां का कुलपति यह कह रहा हो कि नियुक्ति विश्वविद्यालय एक्ट के तहत की गई है, यह भी अर्धसत्य है। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व कालखंड के दौरान 1973 में कुलपति के रूप में सुरेंद्र सिंह की नियुक्ति हो गई। वह हिंदू नामधारी ईसाई थे। कैथोलिक थे। क्रास पहनते थे। नियुक्ति की घोषणा से बनारस में बवाल हो गया। कहा जाने लगा कि सरकार ने मालवीय जी के आदर्शों की हत्या कर दी। उस समय पंडित कमलापति त्रिपाठी कांग्रेस के बड़े नेता और इंदिरा गांधी के करीबी होते थे। उन्होंने दिल्ली जाकर सारी बात इंदिरा गांधी को बताई। इंदिरा गांधी बहुत नाराज हुईं। सुरेंद्र सिंह जब पद ग्रहण करने के लिए दिल्ली से काशी चले तो उन्हें रास्ते में ही ट्रेन से उतरवा लिया गया। बाद में हरिनारायण जी की नियुक्ति कुलपति के रूप में हुई। अमेरिकी लेखक मार्क ट्ेवन ने उन्नीसवीं शताब्दी में कहा था- ‘‘काशी इतिहास से भी प्राचीन, परंपरा से भी पुरानी और मिथकों से भी पहले की है।‘‘ हमें सोचना होगा कि इसके काशी ने कब-कब और कितनी कुर्बानी दी है?