बीच बहस में बच्चे

बीच बहस में बच्चे

दिल्ली के दरियागंज की रहने वाली फरहीन की मासूम बेटी जिकरा मलिक और उसकी गुडिय़ा के रिश्ते बच्चों के खिलौनों के साथ के एक ऐसे संबंध बयां करते हैं, जो विलुप्त से हो गये हैं। आज जब खेल बच्चों की जिन्दगी में मोबाइल और ऑनलाइन तक जा सिमटा हो। तब फिर जिकरा और उसकी गुडिय़ा के रिश्तों की कहानी का चर्चा में आना लाजमी है। जिकरा के पैर में फै्रक्चर है। डॉक्टरों को प्लास्टर चढ़ाना था। लेकिन उसने तभी प्लास्टर चढ़वाया जब उसकी गुडिय़ा को भी प्लास्टर लगाया गया। वह दूध भी तभी पीती है, दवा भी तभी खाती है, इन्जेक्शन भी तभी लगवाती है, जब यह सब उसकी गुडिय़ा के साथ किया जाये।

 

गुडिय़ा- गुड्डा, छुपन-छुपाई, खुट्ïटी मिटठी , खो-खो, विष अमृत, आईस पाइस, कंचे, गिल्ली-डंडा, लगंड़ी कूद, पोशम-पा, घोड़ा जमाल खाये…. सरीखे खेल न जाने कब बीते जमाने की बात हो गये। खिलौनों का अद्भुत संसार खत्म होने लगा है। बच्चे अब लड़की, मिटटी , पत्थर और कपड़ों के खिलौनों से नहीं खेलते। ट्विकंल-ट्विंकल….,लकड़ी की काठी…. सरीखे गीत नहीं गाते। । गुब्बारे, बांसुरी और सीटी बेचने वालों से बच्चों का रिश्ता खत्म हो गया है। गुब्बारे अब खेलने की जगह सजाने के काम आते हैं। खुली हवा में तितली के पीछे दौड़ लगता नटखट बचपन, अठखेलियों में मस्त मासूम बचपन अब गायब हो गया है। लकड़ी के खिलौने बनाने में अयोध्या और बनारस, कठपुतली बनाने में राजस्थान, धातु के खिलौने में बस्तर और कपड़े के खिलौने बनाने में हिमाचल की हैसियत खिलौने के प्रति बच्चों के बदले रूझान की वजह से खत्म हो गयी है।

 

बच्चों की जिन्दगी में नानी की बातों में परियों का डेरा खत्म हो गया है। परी लोक की सैर अब बच्चे नहीं करते। बच्चों के पूरे दिन मोबाइल और प्ले स्टोर पर गुजरने लगे हैं। स्मार्ट गजट्स में खाये रहने वाले बच्चों की सहनशीलता खत्म हो रही है, बल्कि तकलीफों से जूझने की क्षमता भी कम हो रही है। दिल्ली के सफदरजंग, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज और चंडीगढ़ के पीजीआई के संयुक्त शोध में यह पता चला है कि मोबाइल और इंटरनेट से बच्चे आक्रामक हो रहे हैं। दो स्कूूलों के १७४ बच्चों पर यह शोध किया गया है। पोकमॉन गो और द ब्लू व्हेल जैसे गेम बच्चों के जानी दुश्मन हैं। ब्रिटेन ने बच्चों को फेसबुक और इंटरनेट से दूर रखने का फैसला लिया है। बावजूद इसके हमने उन्हें उसी पर छोड़ रखा है। तकनीकि बचपन पर हावी हो रही है। नतीजतन, बच्चों के प्रतीक, बिम्ब और सपने बदल रहे हैं। पहले बचपन ज्यादा सुकून और ज्यादा बेफ्रिक वाला था। बच्चे बरसते पानी में बूंदों का नाद सुनते थे। लेकिन अब उन्हें मिटï्टी से एलर्जी हो रही है। बरसता पानी उन्हें बीमार कर रहा है। बच्चे मौलिक अभिव्यक्ति खो रहे हैं। बच्चों की उम्मीद का स्थापत्य बदल गया।

 

अब बच्चों में खिलौने हिंसा, विभेद और वैमनस्य के बीज बो रहे हैं। समय से पहले ही समझदार बना रहे हैं। उनकी जिज्ञासा से चमकी आंखों में पत्थर जैसे भाव भर रहे हैं। बचपन छिनता जा रहा है। बोझ से दबता बचपन। हम बच्चों को अपनी रूचि के हिसाब से तैयार कर रहे है। कहा जाता है कि खुशी अपने अंदर से आती है, लेकिन हम बच्चों को इस तरह तैयार कर रहे हैं कि उन्हें खुशी बाहर से ढूंढनी पड़ रही है। बच्चों को काम चुनने का अधिकार का आधार उपयोगिता नहीं आनंद होना चाहिए। रेडियो और टेलीविजन ने देशकाल को सिकोड़ दिया। उनका जीवन बाजार के दावं पर लगा है। उनके स्वाद, भोजन, पंसद-नापसंद सब बाजार निश्चित करने लगे हैं। बाजार की सत्ता चलने लगी है। बच्चों के लिए क्या उपयोगी है इसका नियंत्रण समाज और परिवार के हाथ में न होकर बाजार के हाथों में हो गया है। बाजार बच्चों के दिमाग में कूड़ा डालने लगे हैं। बच्चों को बड़ों की दुनिया देकर हम उनकी मासूमियत छिनने पर लगे हैं। उनके मन में एक प्रकार की जड़ता ने घर बना लिया है। जिससे उन्हें सामाजिक सरोकारों से कोई मतलब नहीं रह गया है। अभिभावकों की अंतहीन अपेक्षाएं बच्चों के मौलिक अभिव्यक्ति की संभावनाएं समाप्त कर रही हैं। हर पांच बच्चों में से एक में सहिष्णुता की कमी है।

 

२०१९ में सेव द चिल्ड्रन की रिपोर्ट द एंड ऑफ चाइल्ड हुड इनडेक्स के अनुसार १७६ देशों में भारत की रैकिंग १०० से ऊपर है। चीन ७६वें पायदान पर, मालद्वीप ५४ और श्रीलंका ५६वें स्थान पर है। इस संकेतक के तैयार करने के लिए पांच साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु की स्थिति, कुपोषण, शिक्षा की कमी, बाल मजदूर, बाल-विवाह, किशोर गर्र्भावास्था व संघर्ष द्वारा विस्थापन और बाल हत्या शामिल है। आज की तारीख में हर चार में से एक बच्चे को अपना बचपन नसीब नहीं होता। मनोचिकित्सकों का मानना है कि ६ से १२ वर्ष के आयु के तीन फीसदी बच्चों में अवसाद की समस्या है। भारत में १८ वर्ष कम आयु के बच्चों की संख्या ४७.१९ करोड़ है। जो कुल जनसंख्या का ३९ फीसदी हैं। ०-६ साल के उम्र के बच्चों की तादात २९ फीसदी बैठती है। ७ लाख ३० हजार बच्चे महीने भर के अंदर ही मर जाते हैं।

 

एक हजार में ४८ बच्चे एक साल की उम्र पूरी नहीं कर पाते। अकेले प्रदूषण की वजह से हर साल २ लाख ५१ हजार बच्चे मरते हैं। १४ बरस के ४ लाख ३१ हजार से अधिक बच्चों की मौत होती है। ४० फीसदी बच्चे पांच वर्ष की उम्र पूरी नहीं कर पाते। भूखे बच्चों की तादात में भारत का ९७वां नम्बर है। स्वास्थ्य सुविधाओं के आभाव में ६ साल तक के २ करोड़ ३० लाख बच्चे कुपोषण और कम भोजन के शिकार हैं। अनुसूचित जन जाति के २८ फीसदी अनुसूचित जाति २१ फीसदी, ओबीसी के २० फीसदी और ग्रामीण समुदाय के २१ फीसदी बच्चों में कुपोषण के मामले पाये गये हैं।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की तीसरी रिपोर्ट बताती है कि ४० फीसदी बच्चों का विकास ठीक से नहीं हो रहा है। ६० फीसदी बच्चों का वजन मानक से कम है। हर साल १० लाख से ज्यादा बच्चों की मौत कुपोषण से होती है। १७ सौ मरीजों पर १ डॉक्टर है। ६१०११ लोगों पर एक अस्पताल है। १८३३ मरीजों पर एक बेड। हम जीडीपी का १.४ फीसदी पैसा चिकित्सा पर खर्च करते । दुनिया के १८८ देश की रैकिंग में हमारा १४३ स्थान है।

 

भारत शारीरिक विकास न होने वाले बच्चों में दुनिया का सबसे बड़ा देश है। एनकी तादात ४ करोड़ ८२ लाख बैठती है। पीडियाट्रिक्स ओबेसिटी नामक एक अंतर्राष्टï्रीय शोध पत्र में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक भारत में २०२५ तक मोटापे से पीडि़त बच्चों की संख्या १.७ करोड़ पहुंच जायेगी। मोटे बच्चों के मामले में देश दुनिया में १८४ देशों की सूची में दूसरे स्थान पर आ जायेगा। आंकड़े गवाही देते की भारत बच्चों के लिए दूसरा सबसे खतरनाक देश बन गया है। वालिया चाइल्ड लाइन इंडिया फांउडेशन के मुताबिक २०१५ से २०१८ के तीन सालों में ३.४ बच्चों की कॉल चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर पर आई है। दुनिया के बाल मजदूरों में भारत की हिस्सेदारी ५० फीसदी है।

 

नई शिक्षा प्रणाली ने भी बच्चों को खूब परेशान किया है। बचपन छिनने में इसका भी खासा योगदान है। पांच साल की उम्र से पहले बच्चे को स्कूल नहीं जाना चाहिए। पर पढ़ाई की दुकानों ने तीन साल के बच्चों के लिए अपने दरवाजे खोल दिये। प्रेप और नर्सरी जैसी कक्षाएं चला रखी हैं। अभिभावक भी बच्चों को इन कक्षाओं में भेजना स्टेट्स समझने लगे हैं। उन्हें नहीं पता है कि बच्चों को इन कक्षाओं में पढऩे के लिए भेजना वैसे ही है जैसे कोई कुम्हार माठी को चाक पर चढ़ाये बिना आवें में डाल दे। बच्चोंंं को कम से कम तीन साल तक अपनी मां के पास सोना चाहिए। लेकिन इसी उम्र में हमारी शिक्षा उन्हें होमवर्क में फंसा देती है। होम वर्क फसे बच्चों के पास न प्रश्न है, न जिज्ञासा। होमवर्क उसे दब्बू और डरपोक बना रहा है, कायर बना रहा है। हमारी शिक्षा उनका बचपन छीनने का घोर अपराध कर रही है। इसके चलते बच्चे व्यक्तिवादी सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं। बस्ते के बोझ से उन्हें निजात नहीं मिल पा रही है। ८२ फीसदी बच्चे बहुत भारी बैग ढोते हैं। ५८ फीसदी बच्चे बैग के चलते कमर दर्द से परेशान हैं। बच्चों के घर और स्कूल दोनों जगह उनसे सिर्फ सफलता पाने वाले कार्र्यो का आग्रह होता है। इसके लिए अति अनुशासन और तमाम नियम कानूनों में बच्चों को रखने की कोशिश की जाती है। पर इसे भुला दिया जाता है कि यह गतिविधियां नकारात्मक रूप से बच्चों के व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं। बेंगलूर की एक रिटायर टीचर सरला बच्चों के वाट्सएप और सोशल मीडिया के जरिए कहानियां सुना रही हैं। वह बहुत लोकप्रिय हैं। कहानी वाली नानी के नाम से बच्चें उन्हे जानते है। सरला की लोकप्रियता यह बात बताती है कि बच्चे अपनी पुरानी दुनिया में लौटने को तैयार बैठे हैं। हम है कि लठ्ठ लिये उनका रास्ता रोके हुए हैं। हमें उनके भविष्य का बहाना लेकर जमे बैठे नहीं रहना चाहिए। उन्हेेें प्रकृति और प्रतिकृति के लिए छोड़ देना चाहिए ताकि उनका स्वाभाविक विकास हो सके। हर बीज में एक वटवृक्ष होता है।