सुन बाबा सुन, राजनीति में कितनी धुन

सुन बाबा सुन, राजनीति में कितनी धुन


जब नगीचे चुनाव आवत है।भात मांगव पुलाव आवत है।रफीक शादानी की कविता की ये लाइनें लोकसभा चुनाव के दो माह पहले से ही सच नजर आने लगी है। लोकसभा चुनाव की मुनादी के बाद जिस तरह राजनीतिक दल जनहितैषी बातें करने लगे हैं। उससे तो मन में आता है कि काश हर साल चुनाव होते! जितने भी रुके हुए काम हैं सबको पूरा करने का संकल्प देते-दिलाते छोटे-बड़े सब नेता दिखने लगे हैं। राष्ट्रगान में जनता भले ही भारत भाग्य विधाता की पेचीदगी न समझ पाती हो। लेकिन दौर-ए-चुनाव नेता उसे अपने और भारत दोनों का भाग्य विधाता मानने लगा है।इस चुनाव में नोटबंदी, जीएसटी, तीन तलाक, बैंक घोटाला, राममंदिर, हिन्दुत्व, बेरोजगारी, किसान, नौजवान, सवर्ण आरक्षण, सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, एससीएसटी एक्ट में संशोधन के साथ-साथ राफेल, राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रवाद, राष्ट्रप्रेम और विंग कमांडर अभिनंदन की वापसी जैसे मुददे कसौटी पर हैं। राजनेताओं की विनम्रता देखते बन रही है। नेताओं को नौजवान और किसान याद आने लगे हैं। चुनाव नरेन्द्र मोदी बनाम अन्य हैं। एक ओर मोदी हैं तो दूसरी ओर मोदी विरोध के नाम पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में एकजुट हुआ विपक्ष है। यानी विपक्ष को मोदी के विराट कद का भान है। भाजपा चाहती है कि चुनाव मोदी केन्द्रित हो जाये। विपक्ष इसमें अनचाहे ही सही भाजपा की मदद करते दिख रहा है।इस चुनाव में मोदी हटाओ देश बचाओ का नारा है। 2014 में मोदी की आंधी के बीच ओडिसा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाड़, सिक्किम, नागालैंड और आंध्रप्रदेश के क्षेत्रीय दलों ने अपनी सरकार बचा ली थी। हालांकि सच यह है कि भाजपा या कांग्रेस किसी न किसी राष्ट्रीय पार्टी की छतरी में आये बिना इनकी केन्द्रीय राजनीतिक भूमिका के अवसर सीमित हैं। क्योंकि तीसरा-चैथा मोर्चा बनाने की हर कोशिश हमेशा असफल साबित हुई है। चुनावी घोषणा के साथ ही फिजा में नई सरकार के स्वरूप और संभावना को लेकर सवाल तैरने लगे हैं। एनडीए के पांच दलों ने साथ छोड़ा। तो भाजपा ने बिहार में जेडीयू, झारखंड में आजसू और तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक समेत दो छोटे दलों को साध कर स्कोर बराबर कर लिया है। यूपीए के कुनबे में दलों की संख्या बढ़ ही नहीं रही है। हर आदमी यह जानता है कि निर्णायक सरकार तभी बेड़ा पार। इस चुनाव में 1.5 करोड़ लोग पहली बार वोट करेंगे। जबकि 8.4 करोड़ मतदाता बढ़े हैं। युवा 65 फीसदी सीटों पर हार-जीत में भूमिका निभायेंगे। बीते 66 सालों में पार्टियों की संख्या में 9 गुना और प्रत्याशियों में औसतन 4 गुना इजाफा हुआ है। 1952 में 53 दल थे जो 2014 में बढ़कर 465 हो गये थे। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से डेढ़ गुना ज्यादा खर्च इस चुनाव में होगा। चुनावी खर्च का आकलन करने वाली एजेंसी साउथ एशिया प्रोग्राम का दावा है कि 2019 के चुनाव में 71 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। जबकि पिछले चुनाव में 35 हजार 500 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। बढ़ते हुए खर्च की वजह पार्टियों, नेताओं की ब्रांडिंग और सोशल मीडिया है। कारपोरेट, हवाला, कालाधन और चुनावी चंदे से राजनीतिक दल मालामाल हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद राजनीतिक दल आरटीआई के दायरे में नहीं आना चाहते। पिछला चुनाव महंगा इसलिए भी हो गया था, क्योंकि पहली मर्तबा सोशल मीडिया का उपयोग किया गया था। 2014 में भारत में 12.8 करोड़ स्मार्ट फोन थे, आज 31.7 करोड़ है। 2014 में 10.60 करोड़ लोग सोशल नेटवर्किंग साइट पर थे, आज इनकी संख्या 35.14 करोड़ हो गई है। 2014 में इंटरनेट का उपयोग करने वाले सिर्फ 23.37 करोड़ लोग थे। आज 52.53 करोड़ लोग हैं। 2014 में 9.20 करोड़ लोग फेसबुक का उपयोग करते थे। आज यह आंकड़ा 31.36 करोड़ का है। सोशल मीडिया के आंकड़े ही चुनावी खर्च दोगुना होने की पुष्टि कर देते हैं। आईटी दिग्गज टीबी मोहनदास पई का मानना है कि 4.5 फीसदी वोट सोशल मीडिया इधर-उधर कर सकता है। इसलिए कांग्रेस, भाजपा और तीसरे मोर्चे की स्वप्निल कल्पना लिये दलों के बजट भी सोशल मीडिया के लिए खासे हैं।दिल्ली जीतना है तो यूपी जीतो। यह राहुल और मोदी दोनों को पता है। भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुददे को धार देने वाले अयोध्या, मथुरा, काशी यही हैं। प्रयागराज कुम्भ और नरेन्द्र मोदी द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर का शिलान्यास सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पहल है। उत्तर प्रदेश दिल्ली सरकार का गेट-वे है। राहुल को भी पता है कि इस गेट-वे को पार किये बिना सत्ता का अवसर मयस्यर नहीं है। इसलिए कांग्रेस की ब्रह्मास्त्र कही जाने वाली अपनी बहन प्रियंका गांधी की चाल चल दी है। प्रियंका को उत्तर प्रदेश का महासचिव बनाकर मोदी और योगी के इलाके की कमान दी है। मुलायम सिंह ने स्वीकार कर लिया कि अखिलेश यादव ने बिना लड़े आधी सीटें गंवा दीं। पारिवारिक विवाद से हुए नुकसान की भरपाई के लिए अखिलेश ने मायावती के आगे घुटने टेक दिये जबकि जनाधार पाने की छटपटाहट ने पुरानी रंजिश भुलाकर सपा के साथ गठबंधन की गांठ तब बांधी जबकि इनकी आपसी लड़ाई के मुददे राजनीतिक मुहावरों की शक्ल अख्तियार कर चुके थे। 1993 में सपा और बसपा ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा। सपा 260 उम्मीदवार उतारकर 109 विधायक मिले। बसपा के 163 उम्मीदवारों के एवज में 67 विधायक बने। जबकि भाजपा के हिस्से 177 सीटें आईं। मायावती जिस तरह लगातार अखिलेश यादव को मजबूर कर रही हैं। वह यादव मतदाताओं की अस्मिता भी जगा सकता है। जाटव के अलावा अनुसूचित जनजाति की शेष 66 उप जातियां जो मायावती की पहुंच से बाहर हैं वे रंजिश के बाद अचानक मित्रता को कैसे पचा पायेंगी। किसी भी जर्रे को आफताब बनाने की कूबत रखने वाला उत्तर प्रदेश ही लोकसभा चुनाव का नाभिक होगा।इस चुनाव में तमाम बे सिर पैर की बातें भी होंगी। कुछ शुरू भी हो गई हैं। कहा जा रहा है कि मोदी के सुरक्षा सलाहकार डोभाल आतंकवादी अजहर मसूद को कंधार ले गये। 1971 में पाक से युद्ध के समय वायुसेना के नियमित पायलट राजीव गांधी अपनी पत्नी व बच्चों सहित भारत छोड़कर चले गये थे। ये दोनों गलत हैं। ऐसी बहुत सी बातें सोशल मीडिया आपको बतायेगा। पर यकीन मत कीजिएगा। जांचिए-परखिएगा। यह सोशल मीडिया अनसोशल काम के लिए है।चुनाव लोकतंत्र का शिरा, धमनी और रक्त सब होता है। लोकतंत्र मजबूत होता है। इसलिए जरूरी है कि दम लगाइये, मतदान को सुपरहिट मुद्दा बनाइये। जो बूथ पर जायेगा वही अपनी पसंद का नेता चुनेगा। 2014 में उत्तर प्रदेश में 0.8 फीसदी वोट नोटा में गया था। 2017 में यह आंकड़ा 0.1 फीसदी बढ़ गया। पिछले चुनाव में देश में 1.1 फीसदी लोगों ने नोटा (नन ऑफ द एबब) का बटन दबाया। नोटा का विकल्प उपलब्ध कराने वाला भारत दुनिया का 14वां देश है। यूपी के चार विधानसभा क्षेत्रों में हार-जीत के अंतर से ज्यादा मत नोटा के खाते में गये। एक फीसदी वोट इधर-उधर होने से एक दर्जन सीटों की स्थिति बदल सकती है। देश में ऐसी 23 सीटें है जिनमें 36 से 1178 वोटों के बीच हार-जीत हुई। जबकि 15 सीटों पर हार-जीत 2 से 3 फीसदी वोटों के बीच हुई। छत्तीसगढ़ की महासमुंद सीट पर अंतर 1217 वोटों का था। 2014 में हार-जीत का सबसे कम अंतर जम्मू की लद्दाख सीट पर 36 वोटों का रहा। कांग्रेस के वीरप्पा मोइली, शिवसेना के अनंत गीते और माकपा के मोहम्मद सलीम सबसे कम वोटों से जीतने वाले लोगों में हैं। 29 पुरुष और 20 महिला मतदाता वाला टशीगंज दुनिया का सबसे ऊंचा मतदान केन्द्र है। यह चीन सीमा से 10 किलोमीटर पहले है। यह 15 हजार 256 फिट ऊंचाई पर है।राजनीति बहुत क्रूर होती है। इसका एहसास नेताओं को बखूबी होता है। इंदिरा हारीं, अटल हारे, जेठमलानी हारे, जोशी हारे, आडवानी हारे, मुलायम हारे, मायावती हारीं। बिरले ही नेता होंगे जिन्होंने हार का दंश न झेला हो। पर यह संयोग है कि जो आज दो नेता – नरेन्द्र मोदी- राहुल गांधी आमने-सामने हैं। इनमें से किसी ने भी अपनी हार का स्वाद नहीं चखा। हालांकि राहुल ने अपनी अगुवाई में उत्तर प्रदेश के तीन चुनाव में हार का झटका झेला है। देखना यह है कि भाई-बहन की जोड़ी। मोदी-अमित शाह, अखिलेश-मायावती की एकता में से उत्तर प्रदेश का मतदाता किसे पसंद करता है।