पराभव का पाकिस्तान और नाकाम इमरान

पराभव का पाकिस्तान और नाकाम इमरान

पाकिस्तान के वजीरे आलम इमरान खान ने अपने चुनावी अभियान में कहा था कि खुदकुशी करना पसंद करेंगे, लेकिन कर्ज नहीं लेंगे। हैरतअंगेज यह है कि इमरान जब अपने पहले विदेशी दौरे पर सऊदी अरब पहुंचे तब उन्होंने आर्थिक मदद मांग ली। पिछले पांच साल में पाकिस्तान में कर्ज की राशि 60 अरब डॉलर से पढ़कर 95 अरब डॉलर पहुंच गई है। चीनी कर्ज का सबसे ज्यादा खतरा पाकिस्तान पर मंडरा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से पाकिस्तान तेरहवां बेल आउट पैकेज पाने में कामयाब हुआ है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पाकिस्तान पर कर्ज की बात करें तो यह धनराशि 5.8 अरब डॉलर बैठती है। पाकिस्तान पर कर्ज और उसके जीडीपी का अनुपात 70 फीसदी तक पहुंच गया है। दो-तिहाई कर्ज की राशि 7 फीसदी के उच्च ब्याजदर पर है। पाकिस्तान का राजस्व घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल-फिलहाल अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से पाकिस्तान ने छह अरब डॉलर कर्ज की दरकार की है। यह राशि स्वीकृत भी हो गई है। इस कर्ज को पाने के लिए पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व कर्मचारी रजा वाकिर को अपने केंद्रीय बैंक का गवर्नर बनाया है।

इस कर्ज के मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ज्यादा से ज्यादा लोगों को कर के दायरे में लाने का दबाव बनाएंगे। अभी पाकिस्तान में सिर्फ एक फीसदी लोग ही कर अदा करते हैं। मुद्रा कोष की शर्तों में सात सौ अरब की कटौती के साथ ही साथ नये कर लगाने की भी बात है। मुद्रा कोष की शर्तें इमरान खान की मुश्किलें बढ़ाएंगी। क्योंकि 2017 के मुकाबले पाकिस्तानी रुपया 50 फीसदी नीचे गिर गया है। पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत 112 रुपये के पार है। भुगतान संतुलन पिछले वर्ष के आखीर तक 6.898 अरब डॉलर था। बिजली और गैस इस कर्ज के बाद महंगी करनी पड़ेंगी। मुद्रा कोष ने पाकिस्तान को कर्ज देने की मजबूरी बयां करते हुए कहा है कि पाकिस्तान आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। विकास की रफ्तार धीमी हो गई है। महंगाई बढ़ गई है। कर्ज में डूब गया है। वैश्विक स्तर पर उसकी स्थिति अच्छी नहीं है। पाकिस्तानी सेना ने अपने खर्चों में कटौती का ऐलान किया है। इमरान खान ने इस ऐलान का स्वागत करते हुए कहा है कि हम बचाये गये पैसों का बलूचिस्तान और कबाइली इलाके में इस्तेमाल करेंगे। लेकिन पाकिस्तानी सेना का ऐलान और उस पर इमरान खान की टिप्पणी वैसे ही है जैसे उन्होंने प्रचार अभियान के दौरान कर्ज मांगने से बेहतर खुदकुशी करना कहा था। लेकिन आज वह सिर्फ कर्ज ही मांग रहे हैं। कर्ज के चलते ही चीन की अनाप-शनाप शर्तें स्वीकार करना पाकिस्तान की मजबूरी हो गई है। पाकिस्तान के व्यापार घाटे की सबसे बड़ी वजह चीन ही है। पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के पूर्व अर्थशास्त्री मुश्ताक खान का मानना है कि पाकिस्तानी नीति निर्माता आर्थिक घाटे को कम करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रहे हैं। उनकी कोशिश केवल निरंतर नुकसान के अंतर को कम करने की है। चीन से हमारी समस्या का समाधान संभव नहीं है। करीब 60 अरब डॉलर की सीपीईएस परियोजना के तहत चीन पाकिस्तान में आधारभूत ढ़ांचे का विकास कर रहा है।

पाकिस्तान का वित्त मंत्रालय सेना के खर्चों में कटौती की हकीकत से पर्दा उठाते हुए कहता है कि अगले वित्तीय वर्ष में अनुमानित रक्षा बजट 1.270 ट्रिलियन रुपये का होगा। जो गुजरे हुए रक्षा बजट से 170 अरब रुपये ज्यादा बैठता है। स्टॉक होम इंटनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट की मानें तो 2018 में पाकिस्तान का कुल सैन्य खर्च 11.4 अरब डॉलर था। जो पाकिस्तान की जीडीपी का चार फीसदी बैठता है। मतलब साफ है कि सेना के रक्षा खर्चों में कटौती सिर्फ कोरा आश्वासन है। यह एक सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का बहाना है। इस तरह के ऐलान से इमरान खान पाकिस्तान को आर्थिक मंदी और कर्ज के जाल से कैसे मुक्त करा पाएंगे? 

2018 की व्लूमबर्ग रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान पर 91.8 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज है। छह साल पहले नवाज शरीफ के काल से आज यह 50 फीसदी बढ़ गया है। पाकिस्तान में विदेशी निवेश नहीं आ रहे हैं। सिर्फ एक फीसदी लोगों के कर्ज के दायरे में होने की वजह से अपने संसाधनों से धनराशि का इकट्ठा हो पाना हकीकत में दूर-दूर तक नहीं दिख रहा है। एक कर्ज को अदा करने के लिए दूसरा कर्ज लेना और कर्ज पर ब्याज की दर अदा करने के लिए बड़ा कर्ज लेना पाकिस्तान के लिए अभिशाप ही सही पर अनिवार्य हो गया है। जिस देश के आंतरिक संसाधन वहां के खर्चों की भरपाई कर पाने की स्थिति में न हों, वहां कर्ज दर कर्ज से कोई फायदा पहुंचने वाला नहीं है। यह बात इमरान खान के लिए समझने की है। 

आतंकवाद ने जैसे पाकिस्तान को विदेशी निवेश का केंद्र बनने से रोक रखा है। उससे निजात पाने की स्थिति में जिस तरह इमरान खान नहीं दिख रहे हैं, उससे इस बात का अंदाजा लगा पाना आसान हो जाता है कि इस ऋणजाल से मुक्त होने की स्थिति में पाकिस्तान को अपनी संप्रभुता से खतरनाक समझौता करना पड़ सकता है। महंगाई की मार झेल रहे पाकिस्तान में और अधिक महंगाई की गुंजाइश नहीं दिखती है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कर्ज ढांचे के विस्तार और नये करों के लिए तैयार ही नहीं है। ऐसे में इमरान खान के कर्ज लेकर खुदकुशी करने के बयान से बेहतर होगा कि जो कर्ज उसे हासिल हो रहा है। उससे सिर्फ ब्याज और पुराने कर्ज अदा करने की जगह अर्थव्यवस्था के आधार भूत ढांचे में बढ़ने की दिशा में बढ़ना चाहिए। इमरान खान क्या करेंगे यह उनके बजट में दिखेगा। लेकिन जो कर रहे वह पाकिस्तान को किसी नये मुकाम की ओर ले जाने की यात्रा नहीं है। बल्कि उसे गरीबी के दलदल में ढकेलने और कर्ज की भयावह सुरंग में ले जाने वाला है।