मत बदलो अपनी निष्ठाएँ

मत बदलो अपनी निष्ठाएँ

”असम अकॉर्ड स्वर्गीय राजीव गांधी जी द्वारा ऐतिहासिक तरीके से असम के अंदर शांति विकास की एक नई गति लाने के लिए वहां आसू और दूसरी ऑर्गनाइजेशन के साथ समझौते के तहत दस्तख्त किया गया था। एनआरसी प्रोसेस असम अकार्ड का बेबी है। इस एनआरसी की पूरी प्रक्रिया को काश आपका चैनल अगर वाजपेयी जी कितना पैसा इस एनआरसी के लिए दिया यह दिखाने का साहस करेगा तो आप पायेंगे कि जब भाजपा की पिछली सरकार सत्ता में थी तो पांच लाख रूपये दिया गया। एनआरसी प्रोसेस को २००५ के बाद कांग्रेस की सरकारों ने चालू किया। लगभग ४९० करोड़ की राशि दी गई। २५ हजार इन्यूमीरेटर लगाये गये ताकि विदेशी जो गैरकानून तरीके से असम के अंदर हैं उनकी पहचान हो। पहली ड्राफ्ट लिस्ट आई है। यह उस एनआरसी प्रोसेस का पहला चरण है। २००५ से १३ के बीच में ८२ हजार ७२८ बांग्लादेशियों को कांग्रेस की यूपीए की सरकार के द्वारा डिपोर्ट किया गया। उन्होंने (भाजपा) पिछले चार साल में १८२२ विदेशियों को डिपोर्ट किया। ”

 

यह बात नरेन्द्र मोदी की सरकार के चार साल पूरा होने पर कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सूरजेवाला ने एक संवाददाता सम्मेलन में कही थी। इसकी वीडियो रिकार्डिंग भी उपलब्ध है। आज यही कांग्रेस नागरिक संशोधन कानून और संभावित एनआरसी के विरोध में कमर कस के खड़ी है। इसे देश का दुर्भाग्य कहें कि विपक्ष में आते ही एक ही मुद्दे पर नेताओं के सुर न केवल बदल जाते हैं, बल्कि प्राय: ठीक उलटे हो जाते हैं। नेशनल पापुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) को लेकर भी सत्तापक्ष और विपक्ष के सुर कुछ ऐसी ही बानगी पेश करते हैं। सिटीजनशिप एक्ट १९५५ के सेक्शन १४ (ए) में लिखा है कि केन्द्र सरकार चाहे तो नेशनल रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी बना सकती है। आप सोच सकते हैं कि १९५५ में किसकी सरकार रही होगी। यही नहीं, गृहमंत्री रहे पी चिदम्बरम ने देश में जनसंख्या रजिस्टर की बात पहले रखी थी। वर्ष २००३ में संसद में मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान और बांगलादेश में प्रताडि़त हो रहे अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की वकालत की थी। वह १० साल प्रधानमंत्री रहे। आज उनकी पार्टी इस मुददे पर विरोध प्रदर्शन का हिस्सा है। कभी भारतीय जनता पार्टी आधार, जीएसटी और भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ थी। सत्ता में आते ही उसके सुर बदले। उसने सब स्वीकार कर लिया। कालाधन को लेकर भी कांग्रेस और भाजपा के सत्ता और विपक्ष में अलग-अलग सुर सुने जा सकते हैं। कांग्रेस ने राममंदिर का ताला खुलवाया था पर जब मंदिर आंदोलन को भाजपा ने लपक लिया, तो यह मुद्दा उसकी नजर में धर्मनिर्पेक्षता और साम्प्रदायिकता के रंग में रंग गया। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ३७० मजबूरी में लगाये जाने की बात स्वीकार की थी। उम्मीद की थी कि समय के साथ यह निवीर्य हो जायेगी। उन्हीं की कांग्रेस पार्टी ने ३७० हटाये जाने पर आसमान सर पर उठा लिया है। कांग्रेस जब सत्ता में थी तो ईवीएम पर भाजपा उगंली उठाती थी। जब भाजपा सत्ता में है तो कांग्रेस को लग रहा है कि भाजपा के जीत के पीछे ईवीएम का हाथ है।

 

खाते में सब्सिडी हस्तांतरण पर भी पहले भाजपा कांग्रेस के खिलाफ थी। आज सत्ता में वह कैश सब्सिडी ट्रांसफर स्कीम की मुनादी पीट रही है। कभी वामपंथी सरकार को ममता बनर्जी ने अवैध शरणार्थियों के सवाल पर कटघरे में खड़ा करते हुए अपना पूरा कैपेन चलाया था।

 

सीपीएम के सोमनाथ चटर्जी लोकसभा में स्पीकर थे। ममता बनर्जी संसद में अवैध शरणार्थियों पर बहस पर मांग कर रही थीं। स्पीकर ने इसे खारिज किया तो ममता ने वेल में जाकर उनकी तरफ पेपर फेंके थे। आज वह इन्हीं अवैध शरणार्थियों की राजनीति कर रही हैं। कांग्रेस ने जिस प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को राष्ट्रपति बनाया था। उन्होंने जब एनपीआर के लिए अपना डाटा दिया था। उस समय यह खबर प्रमुखता से छपी थी कि राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल एनपीआर के लिए डाटा देने वाली पहली महिला बनीं। कभी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपनी पूरी सियासत बोफोर्स में गोलमाल और इस तोप के नकली होने के सवाल को लेकर की थी। वह इसी मुददे की हवा में प्रधानमंत्री भी बने। लेकिन वह न तो बोफोर्स को नकली साबित कर पाये। न ही यह बता पाये कि बोफोर्स के दलाली में राजीव गांधी के हाथ कितने सने थे। यही नहीं, जब राजीव गांधी देश में कम्प्यूटर लेकर आये थे। तब उस समय के वामपंथियों और समाजवादियों ने देश में इस तरह हौवा खड़ा किया कि कम्प्यूटर के आने के बाद रोजगार ही खत्म हो जायेंगे। बाद में वामपंथियों और समाजवादियों ने भी देश में कम्प्यूटीकरण को रोकना बेहतर नहीं समझा। पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के रिश्तों को लेकर भी सत्तापक्ष और विपक्ष के सुर बिल्कुल बदले हुए होते हैं। कोई भी पार्टी जो सत्ता में होती है उसकी कोशिश होती है कि इन दोनों देशों से रिश्ते बेहतर रखे। यह बात दूसरी है कि कई बार कोशिश परवान नहीं चढ़ पाती। पर विपक्ष में चाहे जो भी पार्टी हो उसके सुर में चीन और पाकिस्तान को दुश्मन बनाने की बात होती है। सीमा की सुरक्षा का सवाल हो या फिर महंगाई का मुद्दा इन दोनों पर भी कांग्रेस और भाजपा के सुर सत्ता और विपक्ष में अलग-अलग होते हैं।

 

जिस भी देश में राजनेताओं के चरित्र कुर्सी के लिए बदलते हों, उस देश में ऐसे राजनेताओं से किसी बड़ी उम्मीद का रखना बेमानी होगा। हमारे राजनीति का चरित्र कुर्सी हो गया है। सत्तापक्ष और विपक्ष में होते हुए राजनेताओं के बदलते सुर यह बताते है कि इनके लिए कुर्सी देश से बड़ी है। एक समय था कि देश के सवाल पर राजनेता कुर्सी से ऊपर उठकर सोचते थे। जवाहर लाल नेहरू ने अटल बिहारी वाजपेयी में प्रधानमंत्री स्टफ देखा था। पाकिस्तान विजय के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी की मुक्त कंठ प्रशंसा की थी। नरसिम्हा राव ने भारत का पक्ष रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में अपनी पार्टी के किसी सांसद की जगह अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा था। यह सब अब गये दिनों की बात हो गई। ऐसा नहीं हो सकता है कि कोई भी सत्तारूढ़ सरकार दो बार जनमत हासिल करके आये और एक भी काम जनता के हित का न करे। लेकिन विपक्ष किसी एक भी काम की तारीफ न करे। इन दिनों यही रिवाज है। सरकारें भी आया राम, गया राम से बन रही हैं। जिसकी भी हवा होती है निष्ठाएँ बदलकर सांसद और नेता उसी का झंडा थाम लेते हैं। अफसरों के लिए यह नियम है कि सेवानिवृत्ति के बाद या फिर स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर वे किसी औद्योगिक घराने में किसी महत्वपूर्ण पद पर काम नहीं कर सकते। उन्हें कूल ऑफ टाइम गुजारना पड़ता है। एक दल से दूसरे दल में जाने के लिए नेताओं को भी दो साल का कूल ऑफ टाइम मानने को विवश किया जाना चाहिए। शायद इन दो सालों में वह यह सोच सकें कि कुर्सी नहीं देश बड़ा होता है।