आखिर कब चुनाव आयोग के खाने के दांत होंगे

आखिर कब चुनाव आयोग के खाने के दांत होंगे

                                       
देश लोकतंत्र का उत्सव मना रहा है। यह जन पर्व पांच साल के लिए भारत का भाग्य लिखता है। आयोग का नाम आते ही टीएन शेषन का चेहरा याद आना लाजिमी है। वे भारत के ऐसे मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) थे। जिन्होंने इस संस्था को एक नई पहचान दी। बताया कि जनपर्व की आयोजक वही है। इसे उन्होंने नख और दंत दिये। मुझे याद है कि वे अपनी टीम के साथ तैयारियों की समीक्षा करने लखनऊ आये थे। इसके बाद उन्हें प्रेस कांफ्रेंस करनी थी। पत्रकारों को उनकी सुरक्षा में तैनात लोगों से दिक्कत हो गई थी। शेषन से पहला ही सवाल उनकी सुरक्षा को लेकर पूछ दिया गया। शेषन नाराज हुए। बिना कुछ कहे चले गये। शेषन खबर के लिहाज से उन दिनों ‘हाट केक‘ थे। नतीजतन, सुरक्षा को लेकर सवाल पूछने वाले पत्रकार पर सब लोग पिल पड़े। पर इससे बड़ा सवाल यह था कि आखिर अब खबर क्या हो? मैं उन दिनों लखनऊ के एक दैनिक अखबार में था। मेरे दिमाग में आइडिया क्लिक किया कि शेषन की फोटो पर ही खबर बना दी जाए। हमारे अखबार का फोटोग्राफर सबसे स्मार्ट था। मैंने उससे पूछा कि शेषन की आते, नाराज होते और जाते की फोटो है? उसके पास थी। तीनों मुद्रा की फोटो लगाकर कैप्शन लिखा गया- ‘‘शेषन आये, सुरक्षा के सवाल पर नाराज हुए, नमस्ते किये और चल दिये।‘‘ इस घटना का जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि शेषन की इतनी ‘डिमांड‘ थी कि उनकी नाराजगी को भी मीडिया ‘इग्नोर‘ नहीं कर सकता था। शेषन 1991 से 1996 तक सीईसी रहे। बात 1996 की है।

शेषन पालघाट ब्राह्मण थे, जिनके बारे में कहा जाता है कि ये रसोइये, धोखेबाज, सिविल सर्वेंट और संगीतकार होते हैं। शेषन कर्नाटक संगीत के शौकीन थे। उनके समय उनका बोला यह जुमला खासा लोकप्रिय था- ‘‘मैं नाश्ते में राजनीतिज्ञों को खाता हूं।‘‘ चंद्रशेखर सरकार में वाणिज्य मंत्री रहे सुब्रहमण्यम स्वामी ने उन्हें सीईसी बनाने का प्रस्ताव चंद्रशेखर को दिया। 60 के दशक में स्वामी ने हावर्ड में शेषन को पढ़ाया था। 9 दिसंबर, 1991 को जब शेषन के पंडारा रोड के घर पर स्वामी प्रस्ताव लेकर गये तो शेषन ने कहा- ‘‘राजीव गांधी की राय लेकर ही बताएंगे।‘‘ राजीव के पास जब पहुंचे तो उन्होंने चाकलेट मंगाया। जो शेषन और उनकी कमजोरी थी। राजीव गांधी ने सहमति दी। लेकिन जब उन्हें बाहर छोड़ने आये तो बोले, ‘‘वह दाढ़ी वाला शख्स उस दिन को कोसेगा जिस दिन उसने तुम्हें सीईसी बनाने का फैसला लिया।‘‘ शेषन खुद बहुत आस्तिक थे। पूजा-पाठ करते थे। लेकिन सीईसी के कमरे में प्रवेश करते ही अपने पूर्ववर्ती द्वारा लगाई गई भगवान की मूर्तियां हटवा दीं। कभी 30 रुपये की किताब खरीदने के लिए सरकार से मंजूरी लेने और कानून मंत्री के दफ्तर के बाहर इंतजार करने वाले सीईसी की ताकत में शेषन ने इस कदर इजाफा किया कि चुनाव आयोग ने भारत सरकार लिखे जाने पर पाबंदी लगा दी। कहा कि आयोग भारत सरकार का हिस्सा नहीं। 2 अगस्त, 1993 को शेषन ने 17 पेज का एक आदेश जारी कर तहलका मचा दिया। जिसके मुताबिक जब तक सरकार चुनाव आयोग की शक्तियों को मान्यता नहीं देगी तब तक देश में कोई चुनाव कराये जाने पर पाबंदी लगा दी गई। नतीजतन, पश्चिम बंगाल में राज्यसभा का चुनाव रुका। केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी को पद से इस्तीफा देना पड़ा। अफसरों को प्रतिकूल प्रविष्टि देने का अधिकार शेषन ने शुरू किया। उन्होंने शहरी विकास विभाग के संयुक्त सचिव धर्म राजन को प्रतिकूल प्रविष्टि देकर नौकरशाही में भूचाल ला दिया। बिहार में वोट छापना बंद कराया। 

आज भी भारत निर्वाचन आयोग है। पर उसकी नाराजगी और खुशी का मतलब ही खत्म हो गया। मीडिया के लिए इस नख, दंतहीन संस्था का मतलब काफी कम हो गया है। काश! इस आयोग के पास खाने के दांत भी होते। 1993 में हिमाचल के राज्यपाल गुलशेर अहमद को आचार संहिता के उल्लंघन में इस्तीफा देना पड़ा था। उन्होंने सतना से चुनाव लड़ रहे अपने बेटे सईद के प्रचार में हिस्सा लिया था। यही गलती राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने की है। पर इस मामले में आयोग खानापूर्ति करके खामोश बैठ गया। राजनीतिक दल खुलेआम जाति की राजनीति कर रहे हैं। धर्म की सियासत परवान चढ़ रही है। पर संवैधानिक संस्था होने के बावजूद संविधान में धर्म, जाति, क्षेत्र और लिंग विभेद न करने के संकल्प पर आयोग हाथ पर हाथ धरे बैठा है। वह भी तब जबकि जाति मोह एक ऐसी भावना है, जो इंसान को इंसान से दूर करती है। जाति मोह मानव जीवन के बहुत बड़े सच को उभरने से रोकता है। पिछले लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी बीए पास का हलफनामा देती हैं। इस बार बदल देती हैं। उत्तर प्रदेश के एक मंत्री एसपी सिंह बघेल हैं। इस बार लोकसभा का चुनाव आरक्षित सीट से लड़ रहे हैं। तीन बार वह संसद में सामान्य सीट से जाते रहे हैं। भाजपा के ओबीसी सेल के अध्यक्ष भी रहे हैं। 

घनश्याम खरवार राबर्ट्सगंज के सांसद हैं। पर इनकी जाति को लेकर भी सवाल है। रामचंद्र निषाद मल्लाह हैं। पर वो मछलीशहर के सुरक्षित सीट से मजा मार चुके हैं। कर्नाटक में पिछली बार मूलवागल निर्दल जीते थे। पर हाल के चुनाव में कांग्रेस उन्होंने ज्वाइन किया और रिजर्व सीट से मैदान में उतर गये। 2014 के चुनाव में आयोग ने 4,26,077 नोटिस आचार संहिता उल्लंघन की जारी की। लेकिन किसमें क्या हुआ यह लोकतंत्र के इस पर्व पर लोक के पास नहीं है। कोई भगवान को कहीं भी खींच लाता है। अली बनाम बजरंग बली हो जाता है। किसी नेता की जुबान कहीं भी फिसल जाती है। हलफनामे में कोई कितनी भी गलती दर्ज कर दे। लेकिन आयोग संज्ञान तब लेगा जब उसे शिकायत मिलेगी! जिस दिन लोकसभा चुनाव की तिथि घोषित हुई उसी दिन सवाल उठा कि जम्मू-कश्मीर में लोकसभा के साथ ही विधानसभा का चुनाव कराने में आयोग कैसे असमर्थ है। जिस बूथ पर लोकसभा चुनाव के लिए सुरक्षा हो सकती है। उसी बूथ पर उसी दिन विधानसभा के लिए सुरक्षा कैसे नहीं हो सकती? आम आदमी जानता है कि करोड़ रुपये खर्च किये बिना चुनाव जीतना तो छोड़िये, दौड़ में शामिल होना मुश्किल है। समूचा राजनीतिक तंत्र काले धन पर टिका है। पर यह सच आयोग के हाथ ही नहीं लग रहा? पेड न्यूज और फेक न्यूज निरंतर जारी है। अब तो चैनल और अखबार के लोग ही पार्टी का काम करने लगे हैं। पर आयोग की नजर ही नहीं जा रही है? सेना चुनाव में जेरे बहस होती है। पर आयोग हिदायत जारी करके खामोश हो जाता है? घोषणा, संकल्प पत्र और हम निभाएंगे के मार्फत सीधे तौर पर लोक को प्रलोभित किया जा रहा है। एक भी ऐसा राजनीतिक दल नहीं है जिसने जनता से किये गये सभी वादों को अपने किसी कार्यकाल में पूरा किया हो। आयोग कह सकता है कि बहुत सुधार किये गये। लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश सुधार जनहित याचिकाओं के बाद अदालती निर्देश पर हुए। इसके लिए एडीआर को श्रेय देना होगा। राजनीतिक दल चंदे का खुलासा करने को तैयार नहीं हैं। पर आयोग इसे अपने लिए चुनौती नहीं मान रहा है? शायद ही कोई उम्मीदवार हो जो आचार संहिता का पालन करके जीत जाए। लेकिन यह भी आयोग को समझ में नहीं आ रहा है? लोकतंत्र के उत्सव में शरीक होने वाले प्रत्याशियों को छोड़ दें तो हर किसी के चेहरे पर यह सवाल पढ़ा जा सकता है कि आखिर आयोग कि शक्तियां शेषन के कालखंड जैसी फिर कब और कैसे होंगी।