ऐसे गांधी मरा नहीं करते

ऐसे गांधी मरा नहीं करते

30 जनवरी, 1948 को हिन्दू महासभा के नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को दिल्ली के बिडला में शाम 5 बजकर 16 मिनट पर मौत की नींद सुला दिया था। तब से अब तक महात्मा गांधी को मारने की साजिश निरन्तर हो रही है। बीते 71 साल से देश के किसी न किसी इलाके में किसी न किसी दिन कोई न कोई सिरफिरा महात्मा गंाधी को मारने की साजिश में लिप्त आसानी से देखा जा सकता है। लेकिन गांधी को मारने की हर कोशिश उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित करती है। बीते दिनों अलीगढ़ में भारतीय हिन्दू महासभा के सिरफिरे और मंदाध कार्यकर्ताओं ने गांधी की हत्या की सीन को रिक्रियेट करते हुए गांधी की फोटो को गोली मारते हुए नाथूराम गोडसे जिन्दाबाद के नारे लगाकर जिस शर्मनाक हरकत का प्रदर्शन किया है। उसके लिए हिरासत और केस दर्ज करना बहुत छोटी सजा है। लेकिन इस हरकत पर गांधी के गुजरात के नेताओं वाली सरकार खामोशी ओढ़े रही। गांधी के नाम पर सियासत करने वाली दूसरी पार्टी ने इस घटना की नोटिस ही नहीं ली।
अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की राष्ट्रीय सचिव सात लोगों ने मिलकर गांधी के चित्र पर गोली चला कर अपना नाम गोडसे की सूची में लिखवाने की जो कोशिश की है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के बेजा इस्तेमाल की इससे बड़ी कोई नजीर नहीं मिल सकती। हिन्दू महासभा के कार्यकर्ताओं ने जो किया वह उनका पागलपन है। वे निरे अज्ञानी हैं। वे गांधी को बटवारे का जिम्मेदार मानते हैं। मुस्लिमपरस्त मानते हैं। इन मूर्ख अज्ञानियों को नहीं पता कि गांधी के बारे में इसी तरह विचार पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना का भी था। वह भी भारत के बटवारे के लिए गांधी को जिम्मेदार मानते थे। जबकि हकीकत यह है कि सनातनी हिन्दू और मुसलमान दोनों एक मत थे कि गांधी को उनके धार्मिक मामले में कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है। जिन्ना ने एक बार महात्मा गांधी से कहा कि मैं जैसे मुसलमानों का प्रतिनिधि बनकर बात कर रहा हूं वैसे आप हिन्दुओं का प्रतिनिधि बनकर बात कीजिए। आप हिन्दू मुसलमान दोनों का प्रतिनिधि बनकर बात करते हैं। वह मुझे कुबूल नहीं। जबकि गांधी ने कहा कि यह तो मेरी आत्मा के विरुद्ध होगा कि मैं किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष का प्रतिनिधि बनकर सौदा करूं। इस भूमिका मेें किसी बातचीत के लिए मैं तैयार नहीं हूं। उन्होंने ईश्वर को सत्य माना था। लेकिन इन सिरफिरों को गांधी के इन सिद्धांतों सत्य और अहिंसा के उनके प्रयोग के बारे में कुछ भी नहीं पता। गांधी ने सत्य को लोक संभव बनाने की साधना को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने एक ऐसी स्थापना दुनिया के सामने रखी जिसे गांधी से पहले किसी भी चिंतक, धार्मिक या आध्यात्मिक गुरू ने नहीं रखी थी। उन्होंने ‘करो या मरो‘ तथा ‘भारत छोड़ो‘ का जो नारा दिया उसके पीछे जनता जिस तरह उमड़ी। उससे इन सिरफिरों को सबक लेना चाहिए कि उनके साथ मुट्ठीभर लोग भी नहीं थे। गांधी खुद को सनातनी हिन्दू कहते थे। लेकिन हिन्दू होने की उनकी इस कसौटी तक कोई कठमुल्ला फटक नहीं पाया।

किसी भी सिद्धांत और व्यक्ति का विरोध उससे बड़ा और ऊपर खड़ा होकर करना चाहिए। लेकिन इन दिनों विरोध करने वालों की यह मानसिकता हो गई है कि बड़े आदमी का विरोध करके मीडिया में सुर्खियां हासिल की जा सकेंगी। अभद्र मानसिकता वाले लोगों की सुर्खियां हासिल करने की कामना जिस आदमी के विरोध से पूरी हो जाती है। उसका समर्थन करने में इन सिरफिरों की कितनी अभिलाषाएं पूरी होंगी इसका अंदाज लगा पाना इनके लिए संभव नहीं हो पा रहा है। पर यह गांधी के सिद्धांतों के पवित्रता का तकाजा है कि ऐसे अपवित्र लोग उसकी लक्ष्मण रेखा पार करने की शक्ति और सामर्थ ही नहीं रखते। यह गांधी के सिद्धांतों की शक्ति है कि ऐसे लोग बारह रह जाते हैं। क्योंकि इनका गांधी के सिद्धांतों के दायरे में प्रवेश कर जाना उसके खत्म हो जाने की स्थिति होगी। गांधी हिसंक प्रतिरोध की अस्वीकृति की हिमायती थे। जो हिन्दू महासभा के इन लोगों ने की। ऐसी कोशिश पहले भी कई बार हुई है। जिसमें गांधी के जादुई असर की हवा निकाली गई। उन्हें किसी दायरे में बांधा गया। एक पहचान तक सीमित किया गया। वेेेदांतियों ने गांधी को गांधी से मात देने की कोशिश की। एक आदमी की फौज ने सारी जिन्दगी जितनी लड़ाईयां लड़ीं। उससे अधिक लड़ाईयां उसके सिद्धांतों को लडनी पड़ रही हैं।

20 जनवरी, 1948 को बिडला हाउस में गांधी पर हमला हुआ। हमला करने वाले शख्स का नाम मदनलाल पहवा था। उसकी मंशा गांधी जी को चोट पहुंचाने की थी। पर गांधी ने उसे माफ कर दिया। गांधी की अंत्येष्टि के दिन देश की राजधानी की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ा था। लोगों ने गम में अपने सिर मुड़वा लिये थे। हजारों लोग देशी घी लेकर शमशान पहुंचे थे। उनकी अंत्येष्टि की व्यवस्था भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर सर राय बूचर के हाथ थी। गोडसे ने भी पहली गोली चलाते समय गांधी के हाथ जोड़े थे। जो नये गोडसे बने हैं उन्हें यह भी संस्कार नहीं पता। नाथूराम गोडसे को गांधी की हत्या के अलावा किसी काम अथवा नाम से नहीं जाना जाता। नये गोडसे जो हैं उनका भी सिर्फ गांधी की हत्या सीन के रिक्रिएशन के नाते ही जिक्र हो रहा है। गांधी के विचार काया नहीं हैं कि काया से आत्मा को अलग कर दिया जाये। उनके उसूल, विचार अमूल्य हैं। लोगों के दिलों में जिन्दा हैं। लोगों से मिलते-जुलते हुए मुझे इस बात का अनुभव हुआ। यह फिल्म अभिनेता और थियेटर कलाकार दीपक अंतानी ने अपनी गुजरात के भगवान नगर जिले के मनार गांव से सनोसार गांव तक की यात्रा के लम्बे अनुभव के बाद कही। उन्होंने गांधी की पोशाक पहनकर पदयात्रा की। गांधी ने एक बार कहा था कि अंग्रेजों के पास गोलियां थी और मेरे पास सच का हथियार था। गांधी ईश्वर को सत्य मानते थे। सत्य को ही ईश्वर। सत्य हथियारों से, कुकृत्यों से, सिरफिरी हरकतों से मरा नहीं करता। बल्कि बार-बार जीवित होता है। क्योंकि जो लोग यह करते हैं वे असत्य होते हैं। सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।