भीतर पैठ जाने का अवसर देती है कृतज्ञता

भीतर पैठ जाने का अवसर देती है कृतज्ञता

हम वर्तमान के प्रति अनास्थावादी हैं। भविष्य के प्रति इसीलिए आश्वस्त नहीं हो पाते। वर्तमान को जी नहीं पाते। मन वर्तमान में कभी रमता ही नहीं है। जीवन विज्ञान में मन का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है। लेकिन जीवन को संचालित मन ही करता है। वो मन ही है जब वह बौराता है तो सब कुछ बौरा जाता है। वह मन ही है जब वह खुश होता है तो पूरी दुनिया इंद्रधनुष सी सतरंगी लगने लगती है। कहा भी जाता है- मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। पर मन किसने देखा? किसने पाया? किसने दिखाया? बावजूद इसके यही मन हमारा सब कुछ तय करता है। लेकिन इन दिनों हमने अपने मन को निर्लज्ज उपभोक्तावाद में फंसा दिया है। हर कीमत पर जीत जाने की हठधर्मिता ने हमें वर्तमान का आनंद लेने से भी वंचित कर दिया है। मानवीय मूल्यों को स्खलित किया है। जब बरसात का मौसम होता है तो हम जाड़े में आनंदित होने का मन बना लेते हैं। जाड़ा आता है तो हमें गर्मी भाने लगती है। गर्मी में बरसात होने का मन जी उठता है।

हम जब बच्चे होते हैं तो हमें अनुशासन की डोर से बांध कर बड़ा बना दिया जाता है। बड़े होते हैं तो जिम्मेदारियों का पहाड़ बूढ़ा बना देता है। बूढ़े होते ही मृत्यु गीत गाने लगते हैं। साफ है कि हम जहां होते हैं, वहां संतुष्ट नहीं होते। बौराया मन हमें वर्तमान में रमने नहीं देता। उसे पता नहीं क्यों भविष्य में सुख नजर आने लगता है। यह जो भाव है वह हमें कृतज्ञता से दूर ले जाकर खड़ा कर देता है। हम कृतज्ञ नहीं हो पाते। खुद के प्रति, वर्तमान के प्रति, दूसरों के प्रति, भगवान के प्रति। विदेशों में सुबह उठते ही गुड मार्निंग का चलन है। दोपहर में गुड नून। शाम को गुड इविनिंग और रात को गुड नाइट कहा जाता है। इसका सीधा सा मतलब है कि पश्चिम का आदमी कृतज्ञता के भाव से भरा हुआ है। वह गुड मार्निंग कह के यह संदेश देता है कि ‘हे प्रभु‘ हम तुम्हारे प्रति आभारी हैं, कृतज्ञ हैं क्योंकि तुमने यह सुंदर सुबह बनाई है। वह भले ही काम निकालने के बाद थैंक्यु कहने का आदी हो। गलती पर सॉरी बोलना उसका फोनोटिक टोन हो। पर इन सब में अप्रत्यक्ष रूप से ही सही कृतज्ञता झलकती है।

लेकिन हमारे यहां यह सब विलुप्त है। हम सर्वे भवंतु सुखिना की बात करते हैं। पर जो सुख है, उपलब्ध है, उसे जीने को तैयार नहीं है। जो सुख दे रहा है, उसके प्रति कृतज्ञ होने को तैयार नहीं है। हम अभिवादन के लिए नमस्कार और प्रणाम का प्रयोग करते हैं। इसमें कृतज्ञता नहीं होती है, सिर्फ स्वीकृति का भाव होता है। यह आत्म केंद्रित स्वीकृति है। यह व्यष्टिवाची है। समष्टिवाची नहीं है। जब तक यह समष्टिवाची नहीं होगी। तब तक उत्पन्न हुआ कृतज्ञता का भाव भी उपभोग और सुख से जुड़ा होगा और इस जीवन दर्शन में सबको पराजित कर देने की कोशिश होगी। इसमें एक अंदरूनी दबाव होगा कि हम श्रेष्ठ हैं। जबकि होना चाहिए कि हम श्रेष्ठ बनें। आज जीवन सहज हो गया है, परंतु आंतरिक दुनिया या हमारा मानस जटिल होता जा रहा है। हम भरोसे के संकट से जूझ रहे है। हमारे अंदर की लघुता हमें कमजोर करने लगती है। हम प्रतिक्रियात्मक हो जाते हैं। हम छद्म युद्ध का हिस्सा हो जाते हैं। खुशी और गम के आंसू के बाद घड़ियाली आंसू की यात्रा पर निकल लेते हैं। कृतज्ञता का अभाव एकालाप जनता है। हमारी धनात्मक ऊर्जा को खत्म करता है। जिंदगी में चतुर्दिक प्रतिरोध खड़ा होता है। जिस रोशनी की चाह में सब कुछ दांव पर लगाते हैं वह मूलतः रेडियम होता है। जिसे रात के अंधेरे में चमकने के लिए दूसरे की रोशनी के सहारे की जरूरत होती है। दूसरे की रोशनी सहारे के रूप में तभी मिल सकती है जब कृतज्ञता का भाव हो, बोध हो। 


कुछ छूट जाने की कसक और रीत जाने की यादें न हों। बल्कि जो है, सामने है उसे छक कर जी लेने का मन हो। क्योंकि वसंत और पतझड़ के आने का कोई क्रम नहीं होता। जिंदगी में ये बेतरतीब होते हैं। कई बार एक जाने का नाम नहीं लेता तो दूसरा आने का। वर्तमान को जीना, कृतज्ञता का बोध, चेतन से ज्यादा अवचेतन की समस्या है। क्रोध और आक्रोश प्रायः अवचेतन से ही उभरते हैं। कई बार जो है उसे न जीने का सुख और जो नहीं है उसे पाने और जीने के बीच फोटोशाप जितनी ही दूरी होती है। कृतज्ञता का जितना बोध होता है, उतनी यह दूरी कम की जा सकती है। कृतज्ञता सिर्फ यह नहीं बताती कि हम एहसान मंद हों बल्कि जो है उसे जी भरकर जियें। उसे छकें। भविष्य की उम्मीद में वर्तमान न खोयें। मैं बहुत से लोगों को जानता हूं जो योजना बनाते हैं कि रिटायर होंगे तब दुनिया देखेंगे। रिटायर होते हैं तो नई जिम्मेदारियां घेर लेती हैं। हम कल के लिए सपनों को रख छोड़ते हैं। जबकि हमारा सपना या उसका कोई न कोई हिस्सा आज भी पूरा होने की स्थिति में होता है। यदि नहीं होता है तो भी कल पूरे होने वाले सपने से ज्यादा हर्ष, ज्यादा आनंद, ज्यादा सौन्दर्य आज की हकीकत में जिया जा सकता है, पाया जा सकता है। यही नहीं, कल का वह सपना जो आप बरसात में जाड़े का देखते हैं, बचपन में बड़े होने का देखते हैं, अनुपस्थिति में उपस्थिति का देखते हैं। यह तभी पूरा हो सकता है जब आप कृतज्ञ हों। उसके प्रति जो बचपन से बड़े होने, बरसात से जाड़े और अनुपस्थिति से उपस्थिति की यात्रा की डोर थामे बैठा हुआ है। कृतज्ञता का भाव उसे हमें इस यात्रा को सुरक्षित कराने के लिए मजबूर करता है। यही भाव वर्तमान को जी भर जीने के लिए जरूरी है। लेकिन हम ऐसा नहीं करते। हम प्रायः अतीतजीवी हो जाते हैं या भविष्यजीवी। यह अतीत और भविष्य की ओर देखना हमें वर्तमान से अलग लाकर खड़ा कर देता है। वर्तमान से अलग होना ही हमें अमरबेल बना देता है। हमें सहारे की जरूरत आन पड़ती है। कृतज्ञता का बोध हममें होता नहीं नतीजतन, सहारे मिलते नहीं हैं। कृतज्ञता सामने वाले को अंदर तक भर देती है और इससे जो भी उसके अंदर से रिश्ता है वह हमारे लिए थाती हो सकता है। पाथेय हो सकता है।