दुर्बल को न सताईए, जाकी मोटी हाय

दुर्बल को न सताईए, जाकी मोटी हाय


अपने ही देश में अल्पसंख्यकों की हैसियत को लेकर इन दिनों पाकिस्तान काफी घिर गया है। दो नाबालिग हिंदू लड़कियों के अपहरण और फिर धर्मांतरण को लेकर जो बवाल उठा है, वह न केवल पाकिस्तानी मानवाधिकार की पोल खोलता है, बल्कि यह भी बताता है कि अल्पसंख्यकों का जीना पाकिस्तान में कितना मुश्किल है। हद तो यह है कि जब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज दोनों बहनों के अपहरण और धर्मांतरण पर रिपोर्ट मांगती हैं, तब पाक के विदेश मंत्री फव्वाद हुसैन कह उठते हैं, ‘‘पाकिस्तान का आंतरिक मामला है। हमारे लिए अल्पसंख्यक भी उतने अनमोल हैं।‘‘ ट्वीटर के खेल में फव्वाद उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की मुद्रा में आ जाते हैं। वह नसीहत देते हैं कि नरेंद्र मोदी के भारत में अल्पसंख्यकों को तबाह किया जा रहा है। पूरी दुनिया यह मानती है कि अल्पसंख्यकों को जो हैसियत भारत में हासिल है वह दुनिया के किसी देश में नहीं। यहां 18-20 फीसदी आबादी को भी अल्पसंख्यक का ओहदा हासिल है। लव जेहाद के जो कुछ केस सामने आये भी तो उसमें बहुसंख्यकों ने प्रतिक्रिया की। क्रिया नहीं। वह भी ऐसा नहीं जैसा पाकिस्तान में हुआ। वहां होली के दिन हुजूर अली कोहबर और बरकत मलिक ने अपने दोस्तों के साथ अनुसूचित जाति के दो हिंदू लड़कियों का अपहरण कर उन्हें इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया।पाक अखबार ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून‘ में हिंदू नेता शिवमुखी मेघवाल ने कहा, ‘‘रीना और रवीना का अपहरण किया गया है।‘‘ मानवाधिकार कार्यकर्ता जिबरान नासिर ने एक वीडियो वायरल किया है, जिसमें एक बुजुर्ग खुद को थप्पड़ मारते हुए मांग कर रहा है कि मेरी बेटियों को सुरक्षित वापस ला दो या मुझे गोली मार दो। नासिर ने इस पर लिखा है ‘‘यह थप्पड़ वह बुजुर्ग मुआशरे (समाज) के मुंह पर मार रहा है।‘‘ पाकिस्तान ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे‘ की मुद्रा में आ गया है। जब भी कोई इस मुद्रा में होता है तो साफ कहा जा सकता है कि वह सुधरने को तैयार नहीं है। लंदन के माइनाॅरिटी राइट ग्रुप (एमआरजी) का सर्वेक्षण बताता है कि पाकिस्तान दुनिया के उन शीर्ष दस देशों में से एक है जहां अल्पसंख्यक बदतर जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं। एमआरजी के ग्लोबल रैंकिंग आॅफ पिपुल्स अंडर थ्रेट का सर्वेक्षण कहता है कि पाकिस्तान दुनिया का सातवां ऐसा देश है जहां अल्पसंख्यक डर के साये में जीने को मजबूर हैं। सर्वेक्षण के वरीयता क्रम में भारत को नीचे से छठवां स्थान हासिल है। यह रैंकिंग ही पाकिस्तान के विदेश मंत्री का जवाब है। सोमालिया में अल्पसंख्यक सर्वाधिक बदतर स्थिति में हैं। पाकिस्तान में मुस्लिम नहीं तो जीना मुहाल है। बीते 4-5 सालों में जबरन धर्म परिवार्तन की घटनाएं बेतहाशा बढ़ी हैं। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान सरकार हमेशा कट्टरपांथियों का साथ देती नजर आई। अपहरण के बाद हिंदू लड़कियों के साथ दुराचार 90 फीसदी मामलों में किया जाता है। पाकिस्तान के 90 फीसदी जिले ऐसे हैं जहां हिंदू आबादी एक फीसदी से भी कम है। उमरकोट में सबसे अधिक तीन फीसदी हिंदू रहते हैं। 13 करोड़ की आबादी वाले पाकिस्तान में 25 लाख अल्पसंख्यक हैं। 1947 में यहां 20 फीसदी हिंदू थे। जो अब घटकर 1.6 फीसदी रह गये हैं। जबकि भारत में ठीक उलट मुस्लिमों की जनसंख्या में तीन फीसदी का इजाफा हुआ है। जबकि हिंदू 9 प्रतिशत घटे हैं। देश के 40 जिले 50 फीसदी के आसपास मुस्लिम जनसंख्या वाले हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि पारसियों की तादाद दुनियाभर में घट रही है पर पाकिस्तान में बढ़ रही है। पाकिस्तान में बहुत से हिंदू खानाबदोश कबीले की तरह रहते हैं। यहां कोई हिंदू सियासी दल नहीं है। एक समय राना चंद्र सिंह पाकिस्तान के बड़े हिंदू नेता और मंत्री थे। अहमदिया समाज के लोगों की धार्मिक गतिविधियों पर प्रतिबंध है। उन्हें न रोजगार मिलता है और न व्यापार के लिए ऋण। वहां के स्कूलों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत का पाठ पढ़ाया जाता है। मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट ‘स्टेट आॅफ ह्यूमन राइट्स इन 2017‘ के अनुसार, ‘‘देश की सेना की आलोचना या भारत से अच्छे संबंधों की वकालत करने के कारण पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का गायब होना जारी है। ईश निंदा के झूठे आरोपों से चुप रहने को मजबूर किया जाता है।‘‘ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद तथा अमेरिकन सेंटर फाॅर लाॅ एंड जस्टिस के मुताबिक, ‘‘ईसाइयों को उनकी आस्था की खातिर पाकिस्तान में मारा-पीटा जा रहा है, टार्चर किया जा रहा है, उनकी हत्याएं हो रही हैं।‘‘जोगिंद्र पाल मंडल पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री बने थे। उनका रिश्ता ईस्ट बंगाल से था, जो अब पाकिस्तान में है। पाकिस्तान में रहना मंडल ने इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि जिन्ना ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि पाकिस्तान में दलितों के हितों का ध्यान रखा जाएगा। जिन्ना की मौत के बाद 1951 में मंडल भारत आ गये। उन्होंने कहा, ‘‘पकिस्तान में हिंदूओं के साथ नाइंसाफी होती है। हिंदूओं के साथ कभी न्याय नहीं हुआ।‘‘ 1915 में कोलंबिया विश्वविद्यालय में एमए में डाॅ. भीमराव अंबेडकर के प्रबंध का विषय था- ‘‘भारत के राष्ट्रीय लाभांश का इतिहासात्मक और विश्लेषणात्मक अध्ययन।‘‘ 28 दिसंबर, 1940 को उनकी ‘थाट्स आॅफ पाकिस्तान‘ पुस्तक आई, जिसमें उन्होंने लिखा कि मुसलमानों के साथ हिंदुओं का सहअस्तित्व संभव ही नहीं। तैमूर लंग का उदाहरण देकर बाबा साहब अंबेडकर बताते थे कि विभाजन के समय हिंदुओं पर कैसे पैशाचिक जुर्म हुए। उनके मुताबिक हिंदू-मुस्लिम एकता तुष्टीकरण या समझौता इन दो ही रास्तों से संभव है। कभी क्रिकेट के माहिर खिलाड़ी रहे इन दिनों पाकिस्तान के वजीरे आलम इमरान खान से अब यह सवाल है कि क्या उनके नये पाकिस्तान में भी पुराने पाकिस्तान की जड़, मूल, कुप्रवृतियां भी उतनी ही जगह पाएंगी जितनी आतंकवादियों के पाकिस्तान में पाती रही हैं। खेल में एक अलग किस्म की भावना होती है। हार-जीत भले होते हों पर हार-जीत का यह खेल वैमनस्य में कभी नहीं बदलता। भारत बहुत बार पाकिस्तान से हारा है। पाकिस्तान भी कई बार हारा है। यह तो क्रिकेट में हुआ है। पर हाॅकी में हम तो हारते चले आ रहे हैं। हमने जीत पर कोई ऐसा जश्न नहीं मनाया जिससे पाकिस्तानी खिलाड़ियों के सीने पर सांप लोटे। हार पर कोई ऐसी लानत, मलामत और बददुआ नहीं दी जो पाकिस्तान को लग ही जाए। पर अब जो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहा है। उस पर यह कहा ही जाना चाहिए कि- ‘‘बिना जीव की सांस से, लौह भस्म हो जाए।‘‘