चीन से रेशमी रिश्तों की मजबूत होती डोर

चीन से रेशमी रिश्तों की मजबूत होती डोर

चीन से अपने रिश्तों को लेकर खुशफहमी पाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए नरेन्द्र मोदी और शी जिनपिंग की महाबलीपुरम में हुई मुलाकात ने आंख खोलने का काम जरूर किया होगा। इन दोनों नेताओं की मुलाकात में जिस तरह मनभेद और मतभेद वाले मुद्दों को किनारे रखने पर सहमति बनी, उससे जम्मू कश्मीर से 370 निष्प्रभावी किये जाने के मामले में दुनिया भर का ध्यान आकर्षित कराने की मुहिम छेड़ने वाले इमरान को यह तो समझ में आ ही जाना चाहिए कि इमरान को कही से मदद मिलने वाली नहीं है। जिनपिंग का इस सवाल पर तब खामोश होना जब बीजिंग ने जम्मू कश्मीर पर मोदी के फैसले को लेकर सार्वजनिक तौर पर असंतोष और असहमति जताई थी। यही नहीं, पाक अधिकृत कश्मीर इलाके में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना में चीन का भारी निवेश है। भारत अब पीओके की लगातार बात कर रहा है।

 

अमेरिका पहले ही पाकिस्तान को संदेश दे चुका है। महाबलीपुरम से चीन ने भी संदेश दे दिया है। आमतौर पर चीन अच्छा पड़ोसी नहीं माना जाता। राजनय के हिसाब से भारत-चीन के रिश्तों को लेकर विश्वास करना अच्छा नहीं कहा जाता। लेकिन आज चीन को भारत की ज्यादा जरूरत है। चीन अमेरिका के साथ ट्रेडवार झेल रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने चीनी सामानों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। चीन और अमेरिका के बीच चल रहे व्यापार युद्ध के नाते ही संयुक्त राष्ट्र संघ को यह मानना पड़ा है कि दुनिया के 90 फीसदी देशों में मंदी का असर दिखने वाला है। ऐसे में भारत और चीन के बीच का व्यापार चीन के लिए काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत चीन के बीच व्यापार में लाभ चीन के हिस्से जाता है। भारत चीन को कपास, तांबा, हीरा और रत्न भेजता है। जबकि चीन मशीनरी, टेलीकॉम उपकरण, बिजली उपकरण, जैविक रसायन और खाद भेजता है। 2000 में दोनों देशों के बीच कारोबार महज 3 अरब डॉलर था। इस साल इसके 100 अरब डॉलर होने की उम्मीद है। इसमें भारत का निर्यात 18.84 अरब डॉलर का ही है। भारत ने अपने निर्यात सूची में दवाएं, आईटी और इंजीनियरिंग सेवाएं, चावल, चीनी, फल, सब्जियां, मांस उत्पाद, सूती धागा, मिर्च और तम्बाकू के पत्तों को जोडऩे का मन बनाया है।

 

 

किसी भी काम को नरेन्द्र मोदी सिर्फ एक लक्ष्य के लिए नहीं करते हैं। यह उनकी रणनीति होती है। इसीलिए केवल यह मान लेना कि भारत चीन करोबार और दोनों देश के बीच के रिश्तों को प्रगाढ़ करने के लिए दो बड़े नेताओं ने दो दिन की मैराथन अनौपचारिक बैठक की, गलत होगा। इस बैठक से यह अंदाज आसानी से लगता है कि सार्क देशों की जगह बंगाल की खाड़ी के आसपास के देशों पर नरेन्द्र मोदी अपना फोकस बढ़ाना चाहते हैं। इस इलाके में अपने दबदबे का एहसास चीन को कराना चाहते हैं। तमिलनाडु में भाजपा की सरकार नहीं है। ऐसे में नरेन्द्र मोदी ने महाबलीपुरम में बैठककर यह भी संदेश दिया कि केन्द्र तमिलनाडु को महत्व देता है। इस शहर का चीन से रिश्ता पल्लव राजवंश के समय से है। इस वंश के राजा नरसिंह द्वितीय ने अपने दूत को चीन भेजा था। माना जाता है कि पल्लव राजा के तीसरे राजकुमार बौद्ध भिक्षु बन गये थे। उन्होंने चीन की यात्रा की थी। वहां वह बहुत लोकप्रिय हो गये थे। चीनी दार्शनिक महाबलीपुरम का दौरा करते रहे हैं। ह्वेनसांग भी यहां पहुंचा था। 7वीं शताब्दी में यह एक प्रमुख बंदरगाह था। चीन से कारोबार का केन्द्र भी। पल्लव वंश की राजधानी कांचीपुरम आज भी सिल्क के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यहां सिल्क की शुरुआत चीन से आये सिल्क के धागों से हुई।

 

महाबलीपुरम हिन्दू धर्म का एक बड़ा केन्द्र है। इसे मंदिरों का शहर कहते हैं। द्रविड़ वास्तुकला और स्थापत्य के लिए यह शहर जाना जाता है। यूनिस्को की सूची में यह शामिल है। अर्जुन्स पेनेन्स, शोर टेम्पल, रथ मंदिर, कृष्ण मंडपम, क्रोकोडायल बैंक और सांपों का फार्म के साथ ही साथ वाराहगुफा यहां के सैलानियों का मन मोहने के लिए काफी है। अर्जुन्स पेनेन्स में 27 मीटर लम्बे और 9 मीटर चौड़ी व्हेल मछली के पीठ के शिलाखंड पर आकृतियां उकेरी गईं हैं। शोर टैम्पल यानी समुद्री तट पर स्थित विष्णु मंदिर से टकराने वाली सागर की तरंगें और इनसे उपजा संगीत यहां की छटा को बहुगुणित करता है। साल में एक बार मनाया जाने वाला महाबलीपुरम पर्व सैलानियों के लिए विशेष आकर्षण का सबब है।

 

लोकसभा चुनाव के नतीजों के ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर केदारनाथ की एक गुफा में गये थे। आज इस गुफा में जाने और वहां ध्यान लगाने वालों की कतार इतनी लम्बी है कि उत्तराखंड पर्यटन मालामाल हो रहा है। 30 अक्टूबर तक इस गुफा में ध्यान करने की बुकिंग हो चुकी है। वर्ष 2018 में केदारनाथ यात्रा पर 7 लाख लोग पहुंचे थे। जबकि 2019 के सितम्बर महीने में ही यह आंकड़ा 9 लाख पहुंच चुका है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट बताती है कि नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत में पर्यटन के क्षेत्र में काफी सुधार हुआ है। भारतीय पर्यटन की रैकिंग 52वें पायदान से चढ़कर 40वें पायदान पर आ गयी है। पर्यटकों की सुरक्षा के मामले में भारत 15वें स्थान पर आया है। पर्यटन से विदेशी मुद्रा की कमाई में 15.1 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। ई वीजा के बाद तो परिदृश्य ही बदल गया है। इस साल जनवरी से मार्च के बीच के तीन महीनों में 4.67 लाख विदेशी सैलानी भारत आये। जो पिछले साल के इसी कालखंड की तुलना में 45.6 फीसदी अधिक है। देश के घरेलू पर्यटकों ने सबसे ज्यादा रूचि तमिलनाडु घूमने में दिखाई। इनकी तादाद 20.9 फीसदी है। दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश, तीसरे पर कर्नाटक और आंधप्रदेश आता है। हालांकि विदेशी पर्यटकों का रुख महाराष्ट्र की तरफ है। जब भारत और चीन दोनों वैश्विक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर हों तब यह जरूरी हो जाता है कि दोनों एक दूसरे की विकास यात्रा में बाधक न बनें, असहमतियों का प्रबंधन करें। मतभेद और असहमतियों को उस हद तक न जाने दें जहां वह टकराव में बदल जाये। भारत अमेरिकी रिश्ते, पाकिस्तान और चीन के संबंध चाहे जिस दिशा में और जितनी तेजी से चलें पर इन दोनों देशों को यह ख्याल रखना होगा कि इन रिश्तों की गति और दिशा से वैश्विक महाशक्ति बनने की दिशा में कोई बाधा उत्पन्न न हो। महाबलिपुरम में ऐसा ही हुआ है।