प्रेम की धरा, भूली रिझाने की कला

प्रेम की धरा, भूली रिझाने की कला

प्रेम और सेक्स को लेकर हमारे यहां बहुत ढेर सारी लक्ष्मण रेखाएं खींची गईं हैं। तमाम वर्जनाएं खड़ी की गइंर् हैं। इसलिए इन दोनों शब्दों को सही अर्थ में समझना और अपने लिए आनंद का विषय बनाना, अपने दैनिक और दैहिक धर्म में शामिल कर पाना संभव नहीं हो पाया है। जो धर्म था, उसे हमने ‘टेस्ट‘ बना लिया है। हमारे यहां कभी आचार्य रजनीश ने अपने एक लंबे व्याख्यान पर किताब लिखी- ‘‘संभोग से समाधि तक।‘‘ इसके बाद रजनीश लोगों की आलोचना के केंद्र बने। आज की सोशल मीडिया की भाषा में कहें तो उन्हें खूब ट्रोल किया गया। हम यह भूल गए कि हमारे यहां प्रेम की भाषा को खजुराहो और अजंता एलोरा के पत्थरों पर भी उकेरा गया है। वात्स्यायन गंगा के किनारे बैठकर कामसूत्र लिख रहे थे। बता रहे थे कि ‘प्लेजर‘ अच्छा है, कैसे बढ़ाया जा सकता है। एक प्रेम के रूप में मर्द और औरत में बड़ा फर्क होता है। वात्स्यायन कहते हैं स्त्री-पुरुष के बीच लड़ाई बहुत जरूरी है। यह ‘रिलेशनशिप सेक्योर‘ करती है। वात्स्यान कहते हैं कि चुंबन की क्रिया में चहरे की 34 और शरीर की 112 मांसपेशियां भाग लेती हैं। दस सेकेंड का चुंबन होना चाहिए। नार्मल किस दो या तीन सेकेंड की होती है। अंग्रेज लेखक साइमन रेमन का मानना है कि सेक्स एक ओवर रेटेड अनुभूति है, जो केवल दस सकेंड रहती है। 64 कलाओं में 10-12 मस्तिष्क से जुड़ी है। इसके लिए ब्रेन डेवलप करना चाहिए।

 

हमारे यहां प्रेम भक्त और भगवान के बीच भी होता है। प्रेम की लीलाएं आराध्य को रिझाने के लिए भी होती हैं। उसी देश में लोग रिझाने की कला भूलते जा रहे हैं। रिझाने की कला में पैर कुछ खास होते हैं, क्योंकि नर्व एडिंग पैर में होती है। पर पश्चिम ने हर भारतीय चीज को तोड़-मरोड़ कर पेश किया। फिर वही चीज जब भारत आई तो उसका चेहरा इस तरह बदरंग हुआ कि उसे स्वीकारना अतीत से कट जाना था। अपनी सभ्यता और संस्कृति को पलट देना था। हर समाज का एक ‘कमिटमेंट‘ का स्तर होता है। यह हर क्षेत्र में होता है। यह देश, काल, परिस्थितियों के लिहाज से तैयार होता है। जब हम पश्चिम की चीजों को अंगीकार करते हैं तो हमारे इसी ‘कमिटमेंट‘ का स्तर गड़बड़ा जाता है।

 

हमारे आज के युवा के लिए प्रेम रति नहीं है। यह पश्चिम की मनोरंजक प्रतिरोधक प्रवृत्ति है। जो प्रेम में और रति में लिंग निरपेक्ष हो गई। पंजाब की 44 वर्षीय मंजीत संधू और 25 वर्षीय सीरत संधू समलैंगिक विवाह करने वाली पहली महिला बनी। धारा 377 को 1994 में पहली मर्तबा चुनौती दी गई थी। इस बाबत फैसला देते हुए सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीशों दीपक मिश्र, रोहिटंगन नरामन, एएम खान विलूर, डीवाई चंद्रचूण और इंद्र मेहरोत्रा ने कहा कि यौन प्राथमिकता जैविक व प्राकृतिक है। मार्च 2016 में संघ के दतात्रेय ने ट्वीट किया, ‘‘समलैंगिकता कोई अपराध नहीं है। यह सामाजिक रूप से अनैतिक है।‘‘ आज इसके समर्थक मध्यकाल की सखी परंपरा का रिश्ता समलैंगिकता से जोड़ते हैं। प्यूपीईडब्ल्यू सेंटर के ताजा सर्वे के मुताबिक 52 फीसदी अल्पसंख्यक समाज में समलैंगिकता कबूल है। रेनबो फ्लैग एलजीटीबी समुदाय इनकी पहचान है। 1978 में इन्हें मान्यता मिली। गिलवर्ट बेकर ने इसे पेश किया। पहले आठ रंग थे, अब छह रंग हैं। चीन में समलैंगिकता मानसिक बीमारी है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ के 94 देश इसके समर्थक हैं। 94 विरोधी और 46 तटस्थ। दुनिया के 25 से ज्यादा देशों में समलैंगिकों के बीच शादी को कानूनी मान्यता है। जबकि 76 देशों में कोई स्पष्ट कानून नहीं है। वात्स्यायन के कामसूत्र में समलैंगिकता पर अध्याय है। हर दूसरा समलैंगिक मामला उत्तर प्रदेश से है। 377 पर फैसला देते हुए जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा- ‘हर बादल में इंद्रधनुष खोजा जाना चाहिए।‘ 325 एडी में कैथेलिक चर्च ने कहा था कि समलैंगिकता पाप है। आज वह पलट गई है।

 

बाजारवादियों ने स्वतंत्रता शब्द को लेकर युवाओं में भ्रम फैलाया है। अब वे वस्तु सापेक्ष जीवन को ही स्वतंत्रता मानने लगे हैं। गांधी जी कहते थे कि स्वतंत्रता शब्द को बोलते हुए थोड़ा भयभीत और चिंतित होना चाहिए क्योंकि स्वतंत्रता का अर्थ अब सबकुछ होने या घटने की जिम्मेदारी और जवाबदेही अपने मत्थे ले लेना है। उसके पीछे कर्तव्य की एक लंबी श्रृंखला आपकी प्रतीक्षा करती हुई खड़ी है। आज घर यातना शिविर है क्योंकि स्वतंत्रता नहीं है। कैंपस से बाहर समाज में कुंठा का समुद्र है। आज एक नया आनंद अविष्कृत हुआ है, जिसने हर प्रतिरोध का उत्सवीकरण कर दिया है। आंदोलन की जगह उत्सव ने ले ली है। बोल्ड लव, सनी लियोन की देहलीला। माई बॉडी, माई राइट, क्विकर की रैली उत्सव के अविभाज्य अंग हो गए हैं। ‘किस ऑफ लव‘ शुरू हुआ। जो प्यार किसी को दिखाने के लिए किया जाए वह प्यार नहीं प्रतियोगिता है। प्रेम विनिमय के क्षेत्र में प्रवेश कर गया है। सेक्स अपनी गोपनीयता से बाहर आ गया है। प्रेम का स्थान बदला है। वह अब पांच सितारा, काफी डे में होता है। पहले कहवा घरों में होता था।

 

इंटरनेट पर चाइल्ड पोर्न सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है। सेक्स ट्वायज की खरीद में गुजरात तीसरे नंबर पर आता है। यह सारी सूचनाएं डराती हैं। बताती हैं मंत्र, यंत्र बन रहे हैं। लोग संबंध निरपेक्ष जीवन सीखने को आगे आ रहे हैं। जबकि जो भी है वह सापेक्ष है। निरपेक्ष कुछ नहीं होता। सिर्फ शब्द होता है। स्थिति नहीं। उपस्थिति नहीं। अब खुद अपनी नैसर्गिकता को बचाने, बढ़ाने और अक्षुण्य रखने के लिए अपने देश, काल, परिवेश, परिस्थिति, कमिटमेंट और सभ्यता, संस्कृति के लिहाज से काम करने की जरूरत है। पश्चिम मुखापेक्षी होना हमें हमारे अतीत से काटता है। वर्तमान में खड़े रहने की शक्ति क्षीण करता है। भविष्य की सुखद यात्रा करने के लायक नहीं छोड़ता है।