अभिषाप बनता मोबाइल

अभिषाप बनता मोबाइल

विज्ञान और तकनीकी का प्रयोग जरूर होना चाहिए। लेकिन मनुष्य को तकनीकी का गुलाम नहीं होना चाहिए। युवाओं द्वारा स्मार्टफोन के अत्यधिक प्रयोग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा पर चर्चा के दौरान जो कुछ कहा, वह सचमुच एक ऐसा सवाल है, उस पर विचार जरूरी हो गया है। क्योंकि स्मार्टफोन ने आदमी को आभासी दुनिया के खोल में बंद कर दिया है। बड़े बुजुर्गों के साथ जीने का समय ही नहीं रह गया है। जब बड़े बुजुर्गों के साथ जीने का समय ही न बचा हो, तो भारतीय संस्कृति और मूल्य का निरंतर, युवाओं की चेतना से दूर होते जाना स्वाभाविक है। जब हमारा युवा निरंकुश तकनीकी का गुलाम बन रहा हो, वह पिछली पीढ़ी से कटना चाहता हो। ऐसे में पिछली पीढ़ी की जिम्मेदारी बनती है कि मूल्यों और परंपराओं से उसे जोड़ने की कोशिश बंद न करें।

अगर हम शैक्षिक परिसरों के माहौल और आंकड़ों को देखें तो शायद ही कोई ऐसा हाथ हो जिसकी पकड़ में स्मार्टफोन न हो। हद तो यह हो गई है कि कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र एक दिन में औसतन 150 से ज्यादा बार अपना मोबाइल फोन देखते हैं। 23 फीसदी छात्र मोबाइल फोन का इस्तेमाल रोजाना आठ घंटे से ज्यादा करते हैं। 14 फीसदी छात्र रोजाना एक दिन में तीन या उससे कम घंटे मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं जबकि 63 फीसदी छात्र चार से सात घंटे तक मोबाइल इस्तेमाल करते हैं। ये आंकड़े देश के बीस केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा कराए गए शोध से सामने आये हैं। इस शोध का शीर्षक- “स्मार्ट फोन डिपेंडेंसी, हेडोनिजम एंड परचेज बिहैवियरः इम्प्लीकेशन फॉर डिजिटल इंडिया इनिशिएटिव” है।

आंकड़े यह भी बताते हैं कि भारतीय उपभोक्ता औसतन तीन घंटे प्रतिदिन मोबाइल पर गुजारते हैं। कहा जाता है किसी चीज की अति भली नहीं है। इसीलिए जब हमने मोबाइल के उपयोग की अति कर दी है। तब मोबाइल से होने वाली दिक्कतें तेजी से सामने आने लगी हैं। सेल्फी का नशा जिंदगियां लीलता जा रहा है। दुनिया में भारत को सेल्फी के दौरान मरने वाले लोगों की कैपिटल कहा जाता है। सेल्फी लेते समय हुई दुर्घटनाओं में 2011-17 के बीच 259 लोगों की मौत हुई है। संचार क्रांति ने हमारी दुनिया तो बदली, पर हम अब इस बदली हुई दुनिया की बुराइयों के शिकार तेजी से हो रहे हैं।

मोबाइल से निकलने वाले रेडियेशन से पाचन शक्ति कमजोर होती है, नींद कम आती है। रेडियेशन गर्भस्थ शिशु पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। इसी तरह हाल में हुए एक शोध में सामने आया है कि पांच घंटे से ज्यादा मोबाइल का इस्तेमाल करने वाले छात्रों के मोटे होने का खतरा 43 फीसदी तक बढ़ जाता है। मोटापे से दिल के दौरे, असामयिक मौत, डायबिटीज और कैंसर का खतरा बढ़ रहा है। यह शोध एक हजार छात्रों पर किया गया जिसमें 700 लड़कियां और 360 लड़के थे।

दूसरी ओर कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय का शोध बताता है कि वाइब्रेशन मोड पर मोबाइल का इस्तेमाल करने से कैंसर का खतरा बढ़ता है। मोबाइल से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन से दिमाग की कोशिकाओं की वृद्धि प्रभावित होती है जिससे ट्यूमर की आशंका बढ़ती है। मोबाइल शरीर का पानी सोख लेता है। दिमाग में द्रव्य की मात्रा ज्यादा होती है। मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से इस द्रव्य की मात्रा असंतुलित होने लगती है। स्पर्म में तीन प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। मोबाइल की रेडियो फ्रिक्वेंसी से डीएनए के नष्ट होने का खतरा बढ़ता है। मोबाइल के ज्यादा उपयोग से विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र फ्री रेडिकल की संख्या में इजाफा कर देते हैं जिससे बायोलोजिकल सिस्टम गड़बड़ा सकता है। मोबाइल के निर्माण में कैटमियाम, लीथियम, तांबा, सीसा, जस्ता और पारे का प्रयोग होता है। ये सभी विषाक्त माने जाते हैं।
मोबाइल से फोमो (थ्व्डव्) नामक बीमारी होती है। इसे फीयर ऑफ मिसिंग आउट कहते हैं। 2014 में अमेरिका में ये बीमारी रिपोर्ट की गई। यही नहीं, अधिक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने वाले नोमोफोबिया के भी शिकार होते हैं, इसे रिंग एंग्जाइटी कहते हैं। नोमोफोबिया पर हुए शोध के मुताबिक, 77 फीसदी लोगों के लिए मोबाइल के बिना थोड़ा वक्त निकालना भी बहुत मुश्किल होता है। इस रिसर्च में 25 से 34 आयु वर्ग के 68 फीसदी ऐसे लोग थे, जो मोबाइल के बिना रह नहीं सके। 75 फीसदी से ज्यादा लोग बाथरूम में मोबाइल ले जाते हैं। 46 फीसदी लोग मोबाइल में पासवर्ड इस्तेमाल करते हैं। मोबाइल इस्तेमाल करने वाले 50 फीसदी लोग उस समय तनाव में आ जाते हैं, जब उनका एमएमएस ;डडैद्ध या एसएमएस ;ैडैद्ध दूसरा कोई पढ़ लेता है। 18 से 24 साल की लगभग आधी आबादी का कहना है कि मोबाइल की वजह से वह अक्सर थके-थके रहते हैं। वैज्ञानिक इसे टेक्नोफेरेंस कहते हैं। इसके शिकार लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दो अनुसंधानों के परिणाम बताते हैं कि मोबाइल के कारण मनुष्यों के रिश्तों में तनाव का स्तर बढ़ रहा है।

31 जुलाई, 1995 वह तारीख थी, जब देश में पहली मोबाइल काल हुई। यह काल उस समय के संचार मंत्री सुखराम और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु के बीच हुई थी। जिस कंपनी के नेटवर्क पर बात हुई थी उसका नाम मोदी टेल्सट्रा था। उस समय 16 रुपये प्रति मिनट काल दर थी। मोबाइल का आविष्कार मार्टिन कूपर ने किया था। तीन अप्रैल, 1973 को उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी बेल लैप्स के डॉ. जोएल एस. एंगेल को पहला काल किया था। यह काल न्यूयार्क और न्यूजर्सी के बीच थी। पहला टच स्क्रीन फोन 1992 में आईबीएम सीमोन नाम से लांच हुआ। 1993 में पहली डाटा सेवा शुरू हुई। 1998 में फिनलैंड ने पहली रिंग टोन बेची। दुनिया का पहला कैमरा मोबाइल जापान की शार्प नामक कंपनी ने वर्ष 2000 में लांच किया। 2001 में जापान ने 3जी की शुरुआत की। नोकिया और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय मोड़ने योग्य सेलफोन बनाने की दिशा में काफी आगे निकल गए हैं। जिसे मोर्फ कहा गया है। एक आंकड़ा बताता है कि पिछले छह माह में जियो ने जितने ग्राहक जोड़े उतने ग्राहक जोड़ने में आइडिया और एयरटेल को दस साल लग गए।

यह डरावना आंकड़ा बताता है कि मोबाइल अब महज संचार क्रांति का वरदान नहीं एक बड़े अभिशाप के रूप में उभर रहा है। हद तो यह है कि अब मोबाइल से होने वाली बीमारियों से निपटने के लिए मेडिकल कालेजों को विभाग खोलने पड़ रहे हैं। किंग जार्ज विश्वविद्यालय, लखनऊ में खुले इस नये विभाग में तकरीबन दो सौ मरीज रोज आ रहे हैं। मेरे एक साथी और कैंसर के विशेषज्ञ डॉक्टर ने एक दिन बातचीत में मुझसे कहा था कि जब हम लोग कैंसर जैसी घातक बीमारी के निदान की तालीम ले रहे थे, तब कैंसर के गिने चुने मरीज आते थे। मरीज होते ही नहीं थे। आज प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में सेकंड और थर्ड स्टेज के कैंसर मरीज आ रहे हैं। जिनको दवा से ठीक कर पाना संभव नहीं होता है। आपरेशन जरूरी हो जाता है। जरा सोचिए बीस सालों में कैंसर के मरीजों में जितना इजाफा नहीं हुआ उससे अधिक मरीज मोबाइल से होने वाली बीमारियों के अभी सामने आ रहे हैं।