जनादेश से निकले आदेश

जनादेश से निकले आदेश

मोदी है तो मुमकिन है। अमित है तो अमिट है। लोकसभा चुनाव के जनादेश से निकले आदेश को संक्षिप्त तौर पर पढ़ा जाये तो यही संदेश निकलता है। इस जनादेश ने हर नेता, हर राजनीतिक दल के लिए अलग-अलग आदेश दे रखे हैं। मोदी के लिए जनादेश का आदेश यह है कि जनता की उम्मीदों पर खरे उतरने के लिए उन्हें और मेहनत करनी पड़ेगी। क्योंकि वह 2014 की उम्मीदों को विश्वास में बदलने में कामयाब हुए हैं। भाजपा के आक्रामक और मर्दवादी राष्ट्रवाद ने जाति की सारी सीमाएं तोड़कर रख दी हैं। जाति की राजनीति का पराभव हो गया है। 1980 के दशक में अमेरिकी जनता ने आर्थिक मुश्किलों के लिए उस समय के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन को जिम्मेदार नहीं माना। रीगन ग्रेट कम्युनिकेटर थे। इसलिए उनकी गलतियां उनसे चिपकी नहीं। मोदी की कम्युनिकेटर स्किल भी उनसे कम नहीं हैं। इसलिए विपक्ष जिन गलतियों को मोदी पर चस्पा करना चाहता था। वह मोदी पर चिपक ही नहीं  पाई, बल्कि जनता ने इसे विपक्ष का अनर्गल प्रलाप मान लिया। कृषि क्षेत्र के संकट, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट और बेरोजगारी से दूर हटकर वोट दिये तो इसके मायने कुछ अलग हैं। राष्ट्रवाद और देश की सुरक्षा के आगे मतदाता अपनी आर्थिक मुश्किलों को भूल गये।

7.12 करोड़ उज्जवला योजना के लाभार्थी, 35.65 करोड़ जनधन योजना के लाभार्थी, 97.82 लाख आवास योजना के लाभार्थी, 21.44 करोड़ सौभाग्य योजना, 9.27 करोड़ शौचालय के लाभार्थी, 18.35 लाख प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के लाभार्थी, 2.91 करोड़ किसान सम्मान योजना के लाभार्थी इन सब में से किसी ने भी मोदी का साथ नहीं छोड़ा। अपने पांच साल के कार्यकाल में तीन तलाक, नोटबंदी और जीएसटी समेत मोदी के सारे निशाने अचूक निकले। वह एक ऐसे जागूदर के रूप में उभरे जो नामुमिकन को मुमकिन कर सकता है। जीएसटी लागू करने के बाद दुनिया के वह पहले नेता हैं जिन्होंने अपनी सरकार की वापसी की नई इबारत लिखी है। वो अपने संदेश से लोगों को सराबोर कर सकते हैं। लोगों की नब्ज पहचानते हैं। जो इनसे टक्कर लेने उतरता है तो बिखर जाता है। इनकी लहरों के साथ होता है वही तैरता है। इस चुनाव का आदेश है कि भविष्य की राजनीति खोखले नारों पर नहीं होगी, विश्वास की जमीन पर नारे भी चलेंगे और वोट भी पड़ेंगे। व्यक्तिगत आरोप में भी उसी की सुनी जायेगी जो भरोसे के तराजू पर फिट बैठता हो। यह भरोसा सिर्फ खोखले नारों से नहीं जीता जा सकता है, बल्कि इसके लिए राष्ट्रवाद की चाश्नी के साथ-साथ विकास और हिन्दुत्व का कॉकटेल जरूरी है। 

इस जनादेश ने आदेश दिया है कि देश में बहुसंख्यक राजनीति का काल न केवल शुरू हो गया है, बल्कि वह कब तक चलेगा यह कह पाना बहुत मुश्किल है। अल्पसंख्यक वोट बैंक के लिहाज से अप्रासंगिक हो गये हैं। 144 रैलियों और 1.05 लाख किलोमीटर की दूरी की तय करके मोदी ने लोगों के भरोसे की कसौटी पर खुद को कसने के लिए इस तरह पेश किया कि अमित शाह की सांगठनिक दक्षता ने हर नामुमकिन को मुमकिन कर दिया। पार्टी का तंत्र केवल चुनावी मौसम में नजर आया हो ऐसा नहीं है, बल्कि स्थायी तौर पर पार्टी चुनावी अभियान में जुटी रहीं। भाजपा का हर नेता और कार्यकर्ता 24 घंटे पार्टी के लिए काम करता रहा। जनादेश सकारात्मक राजनीति पर जनता की मुहर हैं। मोदी के नेतृत्व और अमित शाह के प्रबंधन ने विपक्ष के मंसूबे चूर कर दिये। यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि जिस चुनाव में नकारात्मकता, अली-बजरंगबली, प्रज्ञा ठाकुर अपने चरम पर रही हां, उस चुनाव में नतीजे सकारात्मकता के चरम तक आयें। इसलिए कहा जा सकता है कि मोदी महारथी हैं, तो अमित शाह सारथी। मोदी ने अपने 2014 के 17.16 करोड़ वोट बढ़ाकर इस बार 22.90 करोड़ वोट करने का कीर्तिमान कर दिखाया। मोदी लोगों में यह विश्वास जगाने में कामयाब हुए कि विपक्ष का कोई दल अपने राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचने की स्थिति में नहीं है। नतीजों ने भाजपा के सांस्कृतिक एजेंडे और सामाजिक समीकरण पर अपनी मुहर लगाई। सेंटर फॉर स्टडी डेवलपिंग सोसाइटी  (सीएसडीएस) का अध्ययन बताता है कि हर तीसरे मतदाता का यह कहना रहा कि मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होते तो वह अपना वोट किसी और पार्टी को देता। फ्रांस और जर्मनी की राजनीति दक्षिणपंथ की ओर है। भारत का दक्षिणपंथी की राजनीति पर दोबारा मुहर इसी वैश्विक ट्रेंड का नतीजा है। राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का कॉकटेल भाजपा ने कुछ इस तरह तैयार किया कि मोदी की छवि काडर आधारित पार्टी से बड़ी हो गई वे उम्मीद और आकांक्षा के प्रतीक बन गये। इस बड़े जनादेश ने बड़ी जिम्मेदारियां भी दी हैं। हालांकि इसका एहसास नरेन्द्र मोदी ने संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद अपने सांसदों से बातचीत में करा दिया। उनकी नसीहत और हिदायतें निःसंदेह दोबारा टिकट पाने और जीतने के लिए अचूक नुस्खा हो सकती हैं। भाजपा ने 97 सांसदों का टिकट काटा जिसमें 79 जीतकर आने में कामयाब हुए। हर फार्मूला और टोटका भाजपा के लिए कामयाब रहा। 

चन्द्रबाबू नायडू के लिए यह संदेश है कि पहले घर में दीपक जलाकर फिर मंदिर में दीपक जलाते हैं। अपनी पोली जमीन का एहसास रखते हैं। ममता बनर्जी के लिए यह संदेश कि वामपंथ की तरह का गुंडा राज नहीं चलने वाला। बंगाल बहुसंख्यक राजनीति के मुहाने पर खड़ा है। देश के फेडरल सिस्टम की जिम्मेदारी सिर्फ नरेन्द्र मोदी की नहीं उनकी भी है। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव के लिए संदेश यह कि गठबंधन की सियासत उनके काम आने वाली नहीं, उनका माई समीकरण भी दरक गया है। पार्टी पराभव की ओर है। मायावती के लिए संदेश यह कि कब तक दूसरों की बैसाखी पर अपना साम्राज्य खड़ा कर पायेंगी। यह मिथ टूट गया कि मायावती अपने वोट ट्रांसफर करा पाती हैं। लालू के लिए संदेश यह है कि यदुकुल के जोड़-गुणा का वोट बैंक राष्ट्रवाद के आगे जीत का समीकरण नहीं तैयार कर सकता। माया, अखिलेश और लालू के लिए यह भी संदेश कि राजनीति गणित से नहीं, कमेस्ट्री से चलती है। कांग्रेस के लिए संदेश यह कि अब पार्टी, फार्मूले और चेहरे नाकाम हो गये हैं। चौकीदार प्योर है। इस पूरे चुनाव में अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के अलावा जो सबसे सुर्ख और बहादुर चेहरा उभरा वह स्मृति ईरानी का है। उन्होंने देश की सबसे पुरानी पार्टी के गढ़ में सेंधमारी कर दिखायी। गढ़ ढहा दिया। देश ने नये ढंग की राजनीति करवट ली है। इसके लिए सभी दल के नेताओं और दलों को नये फार्मूले गढ़ने होंगे। आलोचना से सिर्फ काम चलने वाला नहीं। जो जितना जनता के करीब होगा उसकी जनता उतनी सुनेगी। राजनीति शास्त्र में पढ़ाया जाता है कि सारे एमपी मिलकर पीएम चुनते हैं मगर 2019 के चुनाव में एक पीएम ने अपने साथियों को एमपी बना दिया।