भविष्यजीवि होकर तलाशें हल

भविष्यजीवि होकर तलाशें हल

दार्शनिक डेविड ह्यूम ने नागरिक सरकार की उत्पत्ति को लेकर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि इसके मूल में यह है कि मनुष्य उस संकीर्णता को दूर करने में सक्षम नहीं है, जो उसे भविष्य के मुकाबले वर्तमान को पसंद करने को तैयार करती है। राजनीतिक, प्रतिनिधि और संसदीय बहस हमारी आवेगों और स्वार्थी इच्छाओं को कम करते हैं और समाज के दीर्घकालीक हितों  की पूर्ति नहीं करते। आधुनिक राजनीति ज्यादा दूर तक नहीं देख पाती है। यह एक ऐसा कठोर सच है जिसे स्वीकार करने के लिए हमारे राजनेता तैयार नहीं है। हमारे राजनीतिक दल तैयार नहीं हैं। इसे स्वीकार करने के लिए जितना बड़ा दिल और दृष्टि चाहिए इसका अभाव आज के राजनेताओं में साफ पढ़ा जा सकता है। हमारी राजनीति यथा स्थितिवादी हो गई है। उसके सरोकार सिर्फ वर्तमान से हैं। भविष्य की अगर वह कोई बात करती है तो उसका रिश्ता वर्तमान की योजना को भविष्य के कालखंड में पूरा करने से अधिक नहीं होता है। मतलब हमारी राजनीति यह बताती है कि गरीबी कब तक दूर करनी है। किसानों की आमदनी कब तक दोगुनी करनी है। कितना रोजगार कब तक उपलब्ध कराना है। लोगों को आवास कब तक मुहैया कराना है आदि इत्यादि। भविष्य के लिहाज से यही दृष्टि यह राजनीति और राजनेता की है। इतनी सीमित दृष्टि है। राजनीति से विचार विदा हो रहे हैं। अंग्रेजों ने भारत पर राज करने के लिए बांटों और राज करो की जो नीति अपनायी थी उसी पर हमारे नेता भी कदम बढ़ा रहे हैं। कार्बन उत्सर्जन, शिक्षा, पेंशन, परमाणु कचरा, तकनीकी जोखिम, सार्वजनिक कर्ज जैसे तमाम भविष्य के विषयों पर सियासी दलों के संकल्प पत्र अथवा घोषणा पत्र भी सन्नाटा बुन लेते हैं। इस लिहाज से देखें तो हम कह सकते हैं कि लोकतंत्र बुनियादी रूप से अदूरदर्शी है। वह वर्तमान के पूर्वाग्रहों से मुक्त होने को तैयार नहीं है। राजीव गांधी इकलौते ऐसे प्रधानमंत्री रहे हैं। जिन्होंने 20वीं सदी में बैठकर 21वीं सदी की समस्याओं को ‘एड्रेस’ किया। बाकी के प्रधामंत्रियों ने वर्तमान में ही अपने भविष्य की बलि चढ़ा दी। वर्तमान की जरूरतें पूरी करते-करते भविष्य को अनदेखा कर दिया।नरेन्द्र मोदी जरूर भविष्य के भारत की बात करते हैं। पर उनके भविष्य के भारत की बात का बड़ा सिरा वर्तमान से जुड़ा होता है। वो शिक्षा-प्रणाली बदलना चाहते हैं। पर शिक्षा-प्रणाली कैसी हो यह तय करने के लिए वर्तमान का वही आदमी होता है। जिसे भविष्य से कुछ भी लेना-देना नहीं। थके-हारे इस इंसान के दिमाग में यह घर कर चुका रहता है कि तब तक उसकी जिन्दगी रहेगी ही नहीं। तो फिर फायदा क्या है। उन मुद्दों पर मगजमारी करने का जिसका लाभ उसे न मिले। व्यक्ति अपने बेटे और संतति के लिए भले ही अकूत सम्पति कमाना चाहता हो पर एक ऐसी दुनिया तैयार करना नहीं चाहता जिसमें उसकी आने वाली पीढ़िय़ां उस अकूत संम्पत्ति को निरोग काया और अच्छे और मनचाहे माहौल में ‘इंज्वाय’ कर सकें।पांच सितारा होटल में बोतलबंद पानी टेबिल पर रखकर नदियों में स्वच्छता और जल प्रदूषण पर डिस्कस करने वाले लोग ही वर्तमान रच रहे हैं। होना तो यह चाहिए कि शिक्षा प्रणाली अगर बदलनी हो तो उनसे पूछा जाये जिन्हें आने वाले 10-20 सालों बाद उसे पढ़ऩा हो। जब मोबाइल क्रांति आई तो इस बात पर इतरा रहे थे कि हाथ में फोन है। लेकिन हमे इस बात पर प्रायश्चित नहीं हो रहा था कि इनकमिंग कॉल के भी पैसे वसूले जा रहे हैं। मोबाइल से क्या-क्या खतरा हो सकता है? उसके रेडियेशन के क्या-क्या दुष्प्रभाव हैं? आज 24 सालों बाद हम लोग इस पर जिक्र कर रहे हैं। 22 अगस्त, 1994 को पहली बार तत्कालीन संचार मंत्री सुखराम और पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु के बीच बातचीत से मोबाइल सेवा की शुरुआत हुई थी। अब हम लोग रेडियेशन के दुष्प्रभाव दूर करने के लिए चिकित्सकीय कोशिशें शुरू कर रहे हैं। सेल्फी की धमाकेदार शुरुआत 2011 से मानी जाती है जब नरूटो नाम के मकाऊ बंदर ने इंडोनेशिया में वन्यजीव फोटोग्राफर डेविड स्लाटर के कैमरे का बटन दबा कर अपनी सेल्फी ले ली थी। सेल्फी ने भी जब मानसिक बीमारियों को जन्म देना शुरू कर दिया तब हमारा दिमाग बच्चों को सेल्फी के नुकसान के बारे में बताने को तैयार हुआ है। हम कितने वर्तमानजीवी हैं। यह खेतों की उपज बढ़ाने के लिए खादों के प्रयोग में देखा जा सकता है। हरितक्रांति के नारे ने हमें यह भुला देने को मजबूर किया कि यह खादें कितनी खतरनाक हो सकती हैं। इनसे कितनी बीमारियां हो सकती हैं। हम तो उपज पर इतरा रहे थे।हम दुधारू जानवरों को आक्सोटॉक्सीन का इंजेक्शन लगाकर अधिक दूध निकालने पर इतराने वाले लोग हैं। हमें 30 साल बाद इसके नुकसान के बारे में बताया जा रहा है। हमारी कोशिश अब वर्तमानवाद से उबरने की होनी चाहिए। लोकतंत्र को फिर से नया करने की होनी चाहिए। बुनियादी रूप से लोकतंत्र में जो अदूरदर्शिता समा गई है। उससे निपटने की होनी चाहिए। 2001 से 2006 के बीच इसरायल ने भावी पीढ़ियों की जरूरत के लिए एक लोकपाल बनाया। जिसे भावी पीढ़ी पर किसी कानून के प्रभाव की छानबीन करनी थी। ब्रिटेन स्थित वेल्स में वेल बीइंग फॉर फ्यूचर जेनेरेशन एक्ट के तहत एक कमीशन नियुक्त किया गया। जिसका काम ही यह देखना है कि उस देश के कौन-कौन से कानून भावी पीढ़ी के लिए कितने ओैर कैसे प्रभाव वाले हो सकते हैं। जापान में फ्यूचर डिजाइन नाम से एक नया आंदोलन चल रहा है। नेचर के अर्थशास्त्री तात्सुयोशी सैजो इसका नेतृत्व कर रहे हैं। जिसके तहत वर्तमान लोगों के साथ ही 2060 के भावी नागरिकों के रूप में कुछ लोगों को बैठाया जाता है। नगर निकायों में इस पर लम्बी बहस होती है।  वर्तमान नागरिक और 2060 के भावी नागरिक के बीच बहस से जो कुछ अच्छा निकालता है उसी तरह के नगर बनाये जा रहे हैं। हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि आने वाले 30-40 की समस्याओं के समाधान भी 30-40 साल के भावी जीवन की कल्पना के बीच खोजे जाएं पर हम तो 2019 में रहकर ही 2060 की समस्यायें हल कर लेते हैं और यह भी चाहते हैं कि इस हल को स्वीकार कर लिया जाये। जापान के इस प्रयोग में भावी नागरिकों की अधिकांश योजनाएं वर्तमान नागरिकों की तुलना में ज्यादा प्रगतिशील और क्रांतिकारी होती हैं। क्योंकि वर्तमान नागरिक को एक ओर खुद को पूर्वाग्रह से मुक्त करना मुश्किल होता है। तो दूसरी ओर अगले दो-तीन दशक में खुद को ले जाना और भी दुरूह होता है। हम आज भी फोर लेन बना रहे हैं। जबकि वाहनों का दबाव कम से कम आठ लेन की जरूरत रेखांकित करता है। हमारे राजनेताओं को भविष्य के लिए कायान्तरण करना होगा। वर्तमान और अतीत जीवी से भविष्यजीवी होना होगा।