आइये! जाति-जाति खेलें

आइये! जाति-जाति खेलें


आपको शायद अटपटा लग सकता है। बुरा भी लग सकता है। आपको लग सकता है कि मैं कितना दकियानूस हूं कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डी.फिल. करने के बाद 21वीं सदी में जब लोग अंतरिक्ष की बातें कर रहे हों, तब मैं जाति की बात करता हुआ 18वीं शताब्दी में खड़ा नजर आ रहा हूं। लानत है। लेकिन एक सच यह भी है कि जब से लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई उसके तीन-चार महीने से पहले ही जातीय रसायन इस तरह फेंटा जा रहा है कि मुझे भी वितृष्णा हो गई है। लेकिन पिछले पांच-छह चुनावों का दौर याद करता हूं तो लगता है कि आज जिस तरह जातीय रसायन फेंटा जा रहा है, ऐसा हर चुनाव में होता है। यही राजनेताओं के विजय का पथ है। यही राजपथ है। मुझे चुनाव के दौर में छोटे से लेकर बड़े, तमाम नेताओं से मिलने का मौका मिलता है। लेकिन कोई ऐसा नेता नहीं मिलता जो कास्ट कमेस्ट्री की बात न करे। थोड़े जो इंटेलेक्चुअल हैं उन्होंने इसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दे दिया है। यह नाम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को भी इतना भाया कि बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ आपसी अविश्वास के बावजूद उत्तर प्रदेश में तीन सरकार बनवा दी। यह जाति का ही चक्कर था कि पं. जवाहर लाल नेहरू को अपनी जीत के लिए कान पर जनेऊ चढ़ाकर सार्वजनिक लघुशंका करनी पड़ी। राहुल गांधी की भी जनेऊ अब दिखने लगी है। यह जाति ही थी कि जब के.आर. नरायणन राष्ट्रपति बने तो जाति-पांत को हवा देने वालों को इस बात का फख्र हो गया कि चलो दलित राष्ट्रपति तो बना। जिन अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ 1957 में अपनी उम्मीदवार सुभद्रा जोशी के पक्ष में प्रचार करने जाने से जवाहर लाल नेहरू ने मना कर दिया था। वे भी बाद में ब्राह्मण नेता के रूप में स्थापित किये गए। सरदार पटेल को तो हमने बहुत सालों बाद कुर्मी बना दिया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को तेलीय समाज का बताने की कोशिश इस समाज के जातीय पुरोधा करते दिखते हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह बोफोर्स के भ्रष्टाचार को आधार बनाकर ईमानदारी बनाम बेइमानी की लड़ाई लड़ रहे थे। पर प्रधानमंत्री बनने के लिए यह जुमला उछालना पड़ा कि पृथ्वीराज चौहान के बाद पहली बार कोई राजपूत दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने जा रहा है। नतीजतन, मत चूको चौहान। कल्याण सिंह हिंदू ह्दय सम्राट थे। पर भाजपा से अलग किये जाने के बाद जाति-जाति खेलने लगे। लोगों को पता चल गया कि यह हिंदू ह्दय सम्राट लोध है। एक दौर में खुद को पिछड़ा बताना काफी बुरा माना जाता था। पर जाति के खेल में पिछड़ा बताना शोहरत का सबब हो गया। हद तो यह है कि लोग इस पिछड़ा होने से उबरने को तैयार नहीं हैं।


जाति का खेल राजनीति के लिए कितना मुफीद है यह इसी से समझा जा सकता है कि हर छोटी-बड़ी पार्टी, हर छोटा-बड़ा नेता इसे खेलता नजर आता है। पिछड़ी जमात में शामिल होने की होड़ देखी जा सकती है। नरेंद्र मोदी को जब देश की जनता ने 2014 में सर माथे पर बिठा रखा था, वह प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे यह कहने और सुनने को कोई तैयार नहीं था। तब कानपुर की रैली में आकर उन्हें उद्घोष करना पड़ा कि वह भी पिछड़ी जमात से हैं। वह भी तब, जब वह गुजरात जैसे राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके थे। जनसंघ का आधार वोट ब्राह्मण और वैश्य था। कांग्रेस ब्राह्मण, ठाकुर, दलित और अल्पसंख्यक का जातीय फार्मूला साध कर कई दशक राज करती रही। जो जितना चतुर सुजान और पहुंचा हुआ नेता है, उसे हर संसदीय क्षेत्र की जातीय गणित जरूर आती होगी। भले ही जातीय जनगणना के करीब एक शतक होने को जा रहा है। पर नेता जी के पास सरकार से बड़ा तंत्र है इसलिए वह एक शतक पहले की जातीय जनसंख्या में जनसंख्या वृद्धि की दर जोड़कर अपनी गणित फिट कर लेते हैं।


कांशीराम ने जब राजनीति शुरू की तो इस जाति के फार्मूले को कुछ आगे बढ़ाकर ऐसा फिट किया- जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। जितने भी क्षेत्रीय दल बने उन्होंने जाति के खेल को राष्ट्रीय दलों की तुलना में ज्यादा दिगम्बर किया। हर जातियों के अपने कई संगठन हैं। अगर इनके दावों पर यकीन कर लिया जाए तो भारत की जनसंख्या तीन-चार सौ करोड़ बैठेगी। हालांकि जातीय जनगणना की कवायद भी हुई है। हर नेता इसके खुलासे की बात कहता है। एक बार उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में त्रि-स्तरीय आरक्षण का खेल उसके अध्यक्ष अनिल यादव खेल रहे थे। मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से आता हूं। नतीजतन, प्रतियोगी छात्रों ने मुझसे संपर्क किया। मुलायम सिंह की पार्टी की सरकार थी। इस त्रि-स्तरीय आरक्षण के चलते अगड़ी जमात के कोटे में भी ओबीसी के बच्चे ज्यादा जगह बना रहे थे। मुलायम सिंह ने मेरी पूरी बात सुनी और प्रथम द्ष्टया उन्हें लगा कि मैं सही नहीं हूं। क्योंकि उन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया का एक वाक्य बताया- पिछड़े पावे सौ में साठ। वह कहना चाह रहे थे कि पिछड़ों को 27 नहीं 60 फीसदी आरक्षण चाहिए। मैंने उन्हें बताया कि डॉ. लोहिया के 60 में अगड़े, पिछड़े, अल्पसंख्यक, दलित व चारों जमात की समूची महिलाएं शमिल थीं। वे महिलाओं को पिछड़ा ही मानते थे। इस लिहाज से 60 फीसदी आरक्षण का दावा उलट-पुलट हो जाता है। मुलायम सिंह भले उस समय मान गये। पर इसे पिछड़े और दलित मानने को तैयार नहीं हैं। अगड़ी जातियां भी पिछड़ा बनना चाहती हैं। कुछ पिछड़ी जातियां दलित बनना चाहती है। मुलायम सिंह यादव की पार्टी 17 पिछड़ी जातियों को दलित बनाने पर हमेशा आमादा दिखी है। यह सिर्फ राज्य का विषय नहीं है वरना कब का हो गया होता। हैरतअंगेज यह है कि पिछड़ी जातियों और दलितों में भी जो लोग रहन-सहन, सरकारी नौकरी, यश और समृद्धि के लिहाज से अगड़ों से आगे निकल गये हैं, वे अपनी ही जाति-जमात के लिए पिछड़ा और दलित होना तजने को तैयार नहीं हैं। अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दस फीसदी गरीब सवर्ण आरक्षण दिया तो सवर्णों को लगा कि उनके हाथ कारूं का खजाना लग गया है। जाति अब हथियार हो गई है। बचने की। फंसाने की। बहुत से लोग झूठे दलित एक्ट में फंसे मैंने देखे हैं। पर फंसने और फंसाने वाले दोनों जाति पर फख्र किए बिना नहीं रहते। एक समय लोगों के सम्मान का सबब उनका गुण था। वह किस जाति के हैं यह गौण था। लेकिन आज उनके सम्मान का सबब उनकी जाति है। जाति की कितनी तादाद है। जाति के इस खेल में जीतता सिर्फ नेता है। बाकी सबको हारना है। पर इस खेल के चौसर पर हर कोई प्यादे के रूप में खड़े होने का फख्र जीना चाहता है।