बांटों मत, सिर्फ राज करो

बांटों मत, सिर्फ राज करो

पांच सौ साल से अयोध्या के राम मंदिर को लेकर चल रहे विवाद का अंत सर्वोच्च अदालत ने भले कर दिया हो। लेकिन जिस तरह राजनेताओं के क्षुद्र स्वार्थ टकरा रहे हैं, जिस तरह ट्रस्ट में शामिल करने के लिए जातियों की दावेदारी की जा रही है, उससे यह साफ है कि बड़े-बड़े नेताओं के कितने छोटे-छोटे मन हैं। कहा जा रहा है कि ट्रस्ट निर्माण में जातीय संतुलन नहीं साधे गए हैं। कभी रामजन्मभूमि आंदोलन के नायक कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और इस आंदोलन की हीरो रहीं मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने ओबीसी समुदाय के किसी व्यक्ति को भी ट्रस्ट में शामिल करने का राग छेड़ा है। हाल-फिलहाल ट्रस्ट में नौ स्थायी और छह पदेन सदस्य रखे गए हैं। कल्याण सिंह और उमा भारती के ओबीसी का राग छेड़ते ही यह खुर्द-बुर्द किया जाने लगा है कि ट्रस्ट में सदस्यों की जातीय मौजूदगी क्या और कैसी है? इस पड़ताल में यह सत्य हाथ लगता है कि आठ ब्राह्मण सदस्य फिलहाल हैं। इनमें विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र, डॉ. अनिल मिश्र, निर्मोही अखाड़े के प्रमुख महंत दिनेंद्र दास, स्वामी गोविंद देव गिरि, परमानंद जी महाराज, मध्वाचार्य स्वामी विश्व प्रसन्न तीर्थ, शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती और के. पारासरन का नाम है।

 

इतने ब्राह्मणों का एक साथ होना ओबीसी नेताओं को अखर गया है। ओबीसी के नेता यह भूल रहे हैं कि उन्हें जिस जनता ने सिर माथे पर बिठाया, अयोध्या आंदोलन का हीरो बनाया, विधानसभा और लोकसभा में पहुंचाया, उनमें केवल ओबीसी के लोग ही नहीं थे। अगड़े भी थे। दलित भी थे। भाजपा के गोवा अधिवेशन में पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी ने कहा था कि बड़ी कुर्सियों पर छोटे मन के लोग बैठ गए हैं। यही वजह है कि गुणतंत्र का लोप होता जा रहा है। गणतंत्र अल्पमत का चल रहा है। इसी सोच का नतीजा है कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर देश-प्रदेश के बारे में अच्छी जानकारी रखने वाले, प्रतिबद्ध, राष्ट्रवादी, अच्छे नागरिक और देश के प्रति चिंता रखने तथा देश को आगे ले जाने वाले लोगों की जगह जातियां खोजने और बिठाई जाने लगी हैं। इस बात पर इतराया जाने लगा है कि हमने प्रधानमंत्री सिख बना दिया। ओबीसी का बना दिया। राष्ट्रपति दलित कोटे का बना दिया। आदि, इत्यादि।

 

अब जब जातियों को लेकर जंग जारी है तब यह देखना भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर अयोध्या आंदोलन में जातियां थीं कहां-कहां? हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक, विवादित ढांचा ढहाने तक, मंदिर का ताला खुलवाने तक, रामलला की मूर्ति स्थापित करने तक, कौन-कौन जातियां कब कहां थीं? यह पड़ताल दुख देने वाली हो सकती है। समाज को तोड़ने वाली हो सकती है। यह पड़ताल उन लोगों को प्रसन्नता दे सकती है, जिन लोगों से कई पीढ़ियों की लड़ाई के बाद मंदिर निर्माण की स्थिति तक हम पहुंचे हैं। लेकिन बात निकली है तो दूर तलक जाएगी।

 

अयोध्या के राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र उन लोगों में हैं जिन्होंने विहिप के अशोक सिंघल को कार्यशाला के लिए 10 एकड़ जमीन दान दे दी। यह जमीन उनके मां के नाम थी। यही नहीं, 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद रामलला की मूर्तियां कुछ शरारती तत्वों ने चोरी कर ली। लेकिन आनन-फानन में विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के घर से ही मूर्तियां आईं। इसके आगे अगर कोई यह कहे कि वह बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे, वह ब्राह्मण हैं। यही नहीं, के. पारासरन ने सर्वोच्च अदालत में इस मामले की 9 साल तक हिंदू पक्ष की पैरवी की। अदालत से इस मुकदमे की जीत में उनकी भी बड़ी भूमिका है। डॉ. अनिल मिश्र राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कोटे के हैं। बाकी जिन्हें हम ब्राह्मण ठहरा रहे हैं, वे सबके सब किसी न किसी सम्प्रदाय के संत-महंत, साधु हैं। हमारे यहां कहा गया है- ‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।‘ पर हम यह भी मानने को तैयार नहीं हैं। अगर नहीं तैयार हैं तो कुछ आगे बढ़ते हैं। यह मुकदमा रामलला के ‘नेक्स्ट फ्रेंड‘ के नाते हिंदू समाज जीत पाया है। अपनी नौकरी से छुट्टी पाने के बाद देवकी नंदन अग्रवाल ने रामलला के ‘नेक्स्ट फ्रेंड‘ की ओर से मुकदमे में अपनी दावेदारी जताई। उनके निधन के बाद त्रिलोकी पांडेय रामलला के ‘नेक्स्ट फ्रेंड‘ बने। रामजन्मभूमि न्यास के गठन और इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका रामचंद्र परमहंस और महंत अवैद्यनाथ की रही। अगर जाति पर जाते हैं तो परमहंस जी चतुरी तिवारी थे। महंत अवैद्यनाथ जी क्षत्रिय थे। अशोक सिंघल की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी। वह भी ओबीसी से नहीं थे। हमारा इरादा ओबीसी की बात करने वाले नेताओं को आइना दिखाना है। सवर्ण, पिछड़े और दलित में बांटकर राज करने की मंशा को पराजित करना है। अगर हमारे पूर्वज भी इसी तरह सोचते तो तुलसीदास और वाल्मिकी रामचरित मानस तथा रामायण नहीं रचते। क्योंकि भगवान राम उनकी जाति के नहीं थे। जाति से ऊपर की सोच नहीं होती तो भगवान राम और भगवान कृष्ण समूचे हिंदू समाज के नहीं बल्कि क्षत्रिय और ओबीसी समाज के आराध्य होते।

 

जाति शब्द का उद्भव पुर्तगाली भाषा से हुआ है। राजनीतिक मत के अनुसार यह उच्च ब्राह्मणों की चाल थी। व्यवसायिक मत के अनुसार यह पारिवारिक व्यवसाय से उत्पन्न हुई। कुछ लोग यह फैलाते हैं कि मनु ने अपनी किताब मनुस्मृति में समाज को चार श्रेणियों में बांटा, पर वह बंटवारा जन्मना नहीं कर्मणा था। जाति आधारित व्यवस्था सिर्फ भारत में है। अगर जातियां आज की तरह पहले भी रूढ़ होतीं तो मीराबाई, संत कबीर, संत रविदास, गुरुनानक देव, वाल्मिकी, नाभादास, घासीदास, तुकाराम, संत त्रिवल्लुवर, चोखादास हमारे प्रेरणा पुरुष नहीं बनते और ये भी जातियों के खिलाफ आवाज बुलंद करते। मूलतः जातियों का उद्भव राजनीति के लिए नहीं हुआ था। यह व्यवसाय और पेशों से निर्धारित होती थी। लेकिन आज जातियों का राजनीतिक तौर पर आक्रामक उपयोग किया जा रहा है। तभी तो लोकतंत्र में जाति-धर्म चुनावी हथियार होकर विकसित होते गए हैं। हर चुनाव में जातियों का महत्व और जातिय गोलबंदी साफ देखी जा सकती है। राजनीति जाति केंद्रित हो गई है। नब्बे के दशक से इसकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। तभी तो जाति आधारित दल बनने लगे हैं। जाति आधारित ये दल सियासी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने का जरिया बन गए हैं। आजादी के पहले भी जातीय संगठन थे। पर वे समाज सुधार और जातीय उन्नयन का काम कर रहे थे। अब वे सियासत करने लगे हैं। सियासत में बांटो और राज करो का फार्मूला अचूक माना जाता है। इसी फार्मूले को हमारे नेता राममंदिर निर्माण के लिए बने ट्रस्ट में भी तलाश रहे हैं। खेदपूर्ण है कि यह आवाज जातीय संगठनों की ओर से नहीं उन नेताओं की ओर से आई है, जिन्हें कभी- अभी जनता ने सिंर माथे बिठा रखा है। लोकतंत्र का आभूषण बना रखा है।