इच्छा शक्ति हो तो संस्कृत को मिल सकता है पुराना गौरव

इच्छा शक्ति हो तो संस्कृत को मिल सकता है पुराना गौरव

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जब राज्य सरकार के प्रेस नोट संस्कृत भाषा में भी जारी करने का फैसला सुनाया तब कथित और छद्म वामपंथ एवं धर्म निरपेक्ष ताकतों को भले ही यह भगवाकरण की दिशा में उठाया गया कदम लगा हो लेकिन अपनी प्राचीनता और वैज्ञानिकता के लिहाज से संस्कृत को त्रि भाषा फार्मूले के मद्देनजर भी इस हैसियत की दरकार है। यह फैसला सरकार का संस्कृत भाषा के प्रति निष्ठा और अनुराग जताता है। संस्कृत को देववाणी या सुर भारती कहते हैं। दुनिया की सबसे पुरानी भाषा मानते हैं। हिंद यूरोपीय भाषा परिवार की शाखा है। हिंदी, बांग्ला, मराठी, सिंधी, पंजाबी, नेपाली की यह जननी है। मलयालम, कन्नड़ और तेलगू आदि दक्षिण की भाषाएं संस्कृत से प्रभावित हैं। वैदिक धर्म से संबंधित सभी धर्म ग्रंथ इसी भाषा में लिखे गये हैं। बौद्ध धर्म के महायान और जैन धर्म के कई महत्वपूर्ण धर्मग्रंथ संस्कृत में रचे गये। 

छह हजार वर्षों से संस्कृत साहित्य की रचना होती आ रही है। डॉ. भीमराव अंबेडकर का मानना था कि संस्कृत भारत को भाषाई एकता के सूत्र में बांध सकने वाली इकलौती भाषा है। उन्होंने इसे देश की आधिकारिक भाषा बनाने का सुझाव दिया था। उत्तराखंड राज्य की यह द्वितीय भाषा है। संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है। लेकिन इन दिनों देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। देश में तीन करोड़ से अधिक संस्कृत की पाण्डुलिपियां विद्यमान हैं, जो ग्रीक और लैटिन पाण्डुलिपियों की तुलना में सौ गुना अधिक हैं। कंप्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिए यह सबसे उपयुक्त भाषा मानी जाती है। संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है। उंगली और जीभ लचीले होते हैं। प्रत्येक शब्द के 27 रूप होते हैं। संस्कृत में द्विवचन भी होता है। 

इतनी विशेषताओं के बावजूद यह भाषा सिर्फ कर्मकांड की भाषा बनकर रह गई है। वह भी तब जबकि यह इकलौती भाषा है, जिसमें पृथ्वी परिवार है। सभी के कल्याण की कामना है। राजा भोज के समय संस्कृत जन भाषा रही है। अनपढ़ लोग भी संस्कृत बोलते थे। साउथ एशिया एजूकेशन सोसाइटी के पुरस्कार समारोह में सुषमा स्वराज ने संस्कृत भाषा के उत्कृष्टता के तमाम नमूने पेश कर सबको इस भाषा की महिमा से अवगत कराया था। जब टॉकिंग कंप्यूटर बनाने की बात चली तो संस्कृत को सबसे उपयुक्त भाषा माना गया। इस भाषा की वैज्ञानिकता का ख्याल इसके साहित्यकारों ने कितना रखा है, इसकी नजीर दंडी के नाटक दशकुमार चरितम में मिलती है। यह दस राजकुमारों की कथा है। एक राजकुमार विश्रुत भी है। शिकार खेलते समय विश्रुत के निचले होंठ पर तीर लग जाता है। किताब आगे चलती रहती है, परंतु पूरी किताब में तीर लगने के बाद विश्रुत के मुंह से किसी ऐसे शब्द का उच्चारण नहीं कराया गया है, जो पवर्ग का शब्द हो। 
इस वर्ग के शब्दों का उच्चारण करते समय दोनों होंठों का जुड़ना अनिवार्य है। जब विश्रुत के निचले होंठ कटे हैं तब पवर्ग का उच्चारण न कर पाने की विवशता का ख्याल रचनाकार ने रखा है। यह इस भाषा को वैज्ञानिक बनाता है। संस्कृत भाषा के अक्षरों के उच्चारण स्थान निर्धारित किये गये हैं। ऐसा प्रायः विश्व की अन्य भाषाओं में दृष्टिगत नहीं होता। अ, कवर्ण तथा विसर्ग का उच्चारण स्थान कण्ठ है। इकार, चवर्ग, य, श का उच्चारण स्थान तालु है। ऋ, ट वर्ग, र तथा ष का उच्चारण स्थान मूर्धा है। लृ, तवर्ग, ल् स् का उच्चारण स्थान दांत है। उ, प वर्ग तथा का उच्चारणस्थान ओष्ठ है। भाषा में उच्चारण स्थान का वर्णानुसार वर्णन भाषा में वैज्ञानिकता प्रदान करता है। 

संस्कृत भाषा के प्रत्येक शब्द की उत्पत्ति वैज्ञानिक है। धातु (क्रिया) तथा अनेक प्रत्ययों के योग से शब्दों का निर्माण संस्कृत व्याकरण में बताया गया है। इसी प्रकार धातु (क्रियाओं) के रूप भी वैज्ञानिक हैं, जिनका विस्तृत अध्ययन पाणिनि के व्याकरण ‘अष्टाध्यायी‘ में प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ ‘राम‘ शब्द रम् धातु से ‘घअ‘ प्रत्यय करके बना है। संस्कृत के सभी शब्द नियमानुकूल निर्मित है। प्रायः सभी भाषाओं में तीन काल- भूत, भविष्य और वर्तमान पाये जाते हैं। परंतु संस्कृत भाषा में क्रिया रूपों की इतनी सूक्ष्म वैज्ञानिकता है कि सामान्य भूत, सामान्य भविष्य के अतिरिक्त परोक्ष भूत, अनद्यतन भूत, अद्यतन भविष्य आदि कालों के लिए लकार प्रयुक्त किये जाते हैं। यथा- रमेश गया- रमेशः अगच्छत् (सामान्य भूत)। सीता गयीं- सीता जगाम (परोक्ष भूत) आदि।
संस्कृत भाषा की लिपि ब्राह्मी अथवा देव नागरी है। अन्य रोमन आदि लिपियों में भी संस्कृत भाषा लिखि जाती रही है। इसमें जो लिखा गया है वही पढ़ा जाता है। जैसे- राजेंद्र नागर इसी को यदि रोमन लिपि में लिखें तो वैज्ञानिकता का अभाव हो जाता है। उसे कोई ‘राजेंद्र नागर‘ के बजाय ‘राजेंद्र नगर‘ भी पढ़ सकता है जो अभीष्ट नहीं होगा। वैदिक संस्कृत भाषा में उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों का प्रयोग अत्यन्त वैज्ञानिक है। स्वराघात से अर्थ बदल जाता है। इन्हीं स्वर वैज्ञानिकता के कारण वेदों में कोई भी व्यक्ति एक अक्षर अथवा शब्द परिवर्तित नहीं कर सकता है अन्यथा संपूर्ण मंत्र ही बदल जायेगा। लौकिक संस्कृत भाषा में भी स्वरों की व्यवस्था थी परन्तु शनैः शनैः लुप्त हो गई। संस्कृत में वाक्य विन्यास अथवा शब्दबोध की प्रक्रिया परम वैज्ञानिक है। न्याय तथा मीमांसा दर्शन में इसकी जटिलता को बताया गया है। अनन्वित तथा अन्वित दोनों अवस्थाओं में कर्ता, कर्म, क्रिया, विशेषण तथा क्रिया विशेषण के आर्डर में भिन्न होने पर भी शब्दबोध (शब्द के अर्थ का ज्ञान) वाक्यार्थज्ञान में कोई अंतर नहीं आता है। अंग्रजी आदि भाषाओं में आर्डर परिवर्तन से वाक्य के अर्थ में परिवर्तन हो जाता है। 

आचार्य पाणिनि ने संस्कृत का वैज्ञानिक व्याकरण बनाया है जिसे ‘अष्टाध्यायी‘ के सूत्रों में निबद्ध किया है। महाभाष्यकार पतन्जलि ने इसे व्याख्यात करके इसकी वैज्ञानिकता को प्रमाणित किया है। पाणिनि का संस्कृत व्याकरण जितना वैज्ञानिक है, संसार की किसी भाषा का व्याकरण उतना समृद्ध और वैज्ञानिक नहीं है। कंप्यूटर के माध्यम से प्रोग्रामिंग करके संस्कृत व्याकरण के नियम निबद्ध किए जा सकते हैं, जिससे क्षण भर में शब्द रूप, आतु रूप, प्रयाय रूप, समास, संधि और विभक्त्य पर्व का बोध कराया जा सकता है। 

भाषा के लिए संस्कृत शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वाल्मिकी रामायण के सुंदर कांड के सर्ग 30 में किया गया है। सर्व प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद से लेकर आज तक संस्कृत भाषा अक्षुण्य बनी हुई है। इतने समय के अंतराल में अनेक भाषाएं संसार में विकसित हुई और नष्टप्राय हो गई। परंतु संस्कृत भाषा अपने वैज्ञानिक आवरण के कारण बिना किसी राजाश्रय के आज भी जीवित और गतिशील हैं। ऐसे में अगर एक पीठाधीश्वर की सरकार उसे राजाश्रय प्रदान करती है तो आगा-पीछा सोचने की जरूरत नहीं होनी चाहिए बल्कि इस कदम की तारीफ करते हुए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि यदि इच्छा शक्ति हो तो संस्कृत को हिब्रू की तरह पुनः प्रचलित भाषा बनाया जा सकता है। इस दिशा मं कुछ कदम और आगे बढ़ने की जरूरत है, क्योंकि कश्मीर से कन्याकुमारी तक छोटे या बड़े पैमाने पर संस्कृत जरूर पढ़ी जाती है। हर कर्मकांड में बोली जाती है।