आभासी दुनिया के शिकंजे में लोस चुनाव 2019

आभासी दुनिया के शिकंजे में लोस चुनाव 2019

गंदा है पर धंधा है। यह बात इन दिनों सोशल मीडिया यानी वर्चुअल वर्ल्ड में लड़े जा रहे चुनाव में देखी जा सकती है। सोशल मीडिया चुनाव को इस तरह परोस रहा है मानो उसकी जिम्मेदारी किसी की भी छवि किसी भी तरह से बिगाड़ने की है। आम तौर पर नेता चुनाव में अपनी छवि निखारने का काम करते हैं। उनकी कोशिश होती है कि उनकी कमीज दूसरे की कमीज से ज्यादा सफेद हो। पर सोशल मीडिया पर लड़ी जा रही चुनावी जंग इसके ठीक उलट हालात बयां कर रही है। इस पर की जा रही कोशिशें यह बताती हैं कि चुनावी अभियान का मतलब दूसरे की कमीज को अपनी कमीज से ज्यादा गंदा करना है। इसीलिए बेसिर पैर की बातें आपको सोशल मीडिया पर पढ़ने और देखने को मिल रही हैं। राष्ट्रवाद और राष्ट्र प्रेम की जंग, धर्म निरपेक्षता और सांप्रदायिकता की जंग एक-दूसरे की गर्दन उतारने पर आमादा हैं। राष्ट्रवाद की जंग हिन्दू आतंकवाद तक लाई गई। राष्ट्रवाद लोगों के किसी समूह की उस आस्था का नाम है जिसके तहत वो खुद को साझा इतिहास, परंपरा, भाषा, जातीयता और संस्कृति के नाम पर एकजुट मानते हैं। भारत में राष्ट्रवादी विचारधारा का अंकुर सत्रहवीं शताब्दी के मध्य से उगने लगा था किन्तु यह धीरे-धीरे विकसित होता रहा। अन्त में 1857 में पूर्ण हो गया। इस आधार पर यह कह सकते हैं कि भारत में राष्ट्रवाद का उदय 18वीं शताब्दी में विदेशी प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए हुआ। बाद के दौर में भारतीयों को जो ब्रिटेन की बर्बर नीति से जूझ रहे थे, वर्क, मिल, ग्लैंडस्टोन, ब्राइट और लार्ड मैकाले को सुनने का अवसर मिला। मिल्टन, शेली बायरन जैसे कवियों की कविताएं पढ़ने एवं वाल्टेयर, रूसो, मेजिनी जैसे विचारकों को जानने के बाद भारतीयों का राष्ट्रवादी विचार परिपक्व हुआ।

कई समानताओं के बावजूद राष्ट्रवाद और देश प्रेम में अंतर है। राष्ट्रवाद अनिवार्य तौर पर किसी न किसी कार्यक्रम और परियोजना का वाहक होता है जबकि देशभक्ति की भावना ऐसी किसी शर्त की मोहताज नहीं होती है। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने राष्ट्रवाद को चुनौती दी थी लेकिन भूमंडलीकरण की समाप्ति के साथ ही राष्ट्रवाद को जगह मिलने लगी। सोशल मीडिया ने राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रेम के बीच के अंतर को खत्म करके यह फैलाना शुरू कर दिया कि जो हमारे साथ नहीं है वह हमारा दुश्मन है। साथ रहने की शर्त भी सोशल मीडिया पर अपने विचार डालने वाले से तय होती है। यह धारणा मानसिक बंधुआगिरी को स्थापित करती है। लेकिन लोकतंत्र में साथ नहीं रहने वाले के भी कद्र का चलन है। विपक्ष की हैसियत सत्ता पक्ष से सदन में कम नहीं मानी जाती। सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी होती है कि वह विपक्ष को भी जीवित रखे। पर सोशल मीडिया पर विपक्ष के लिए कोई स्पेस नहीं है। सोशल मीडिया संदेश का वाहक नहीं प्रतिशोध का प्लेटफार्म है। यह स्थिति खतरनाक है। इसकी पहुंच का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि फेसबुक पर 2.2 बिलियन लोग हैं। जबकि स्नैपचैट पर 400 मिलियन, ट्विटर पर 321 मिलियन, इंस्टाग्राम पर एक बिलियन लोग अपने विचार को प्रकट करते हैं। इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की उपयोग क्षमता भी 4.4 बिलियन है।

देश में स्मार्ट फोन उपयोग करने वालों की तादाद 299.24 मिलियन है। भारत में पहला स्मार्टफोन 22 अक्टूबर 2008 को इस्तेमाल किया गया था। यह एचटीसी कंपनी का ड्रीम मॉडल फोन था। दुनिया का सबसे पहला मोबाइल फोन मोटोरोला कंपनी ने 3 अप्रैल 1973 को बनाया। सबसे पहले इस फोन की कीमत लगभग 2 लाख रूपए थी, जिसकी बिक्री सबसे पहले अमेरिका में शुरू हुई। एसोचेम की रिपोर्ट बताती है कि पिछले इलेक्शन में सोशल मीडिया पर 400 से 500 करोड़ रुपए सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों ने मिलकर खर्च किये। भारत निर्वाचन आयोग में दाखिल एक रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा ने 714.28 करोड़ रुपए तथा कांग्रेस ने 200 करोड़ रुपए खर्च किये जबकि 2009 के चुनाव में दोनो पार्टियों ने मिलकर सोशल मीडिया पर 791 करोड़ रुपए व्यय किये थे। 

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ (सीएमएस) के अनुसार इस बार 11 अप्रैल को शुरू होकर 19 मई को संपन्न होने वाली मतदान की प्रक्रिया पर 500 अरब रुपये (7 अरब डॉलर) की अभूतपूर्व लागत आएगी। अमेरिकी राजनीति में धन के इस्तेमाल पर नज़र रखने वाली संस्था ओपेन सीक्रेट्स डॉट ऑर्ग के अनुसार 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति और संसदीय (कांग्रेस के) चुनाव पर करीब 6.5 अरब डॉलर खर्च हुए थे। सीएमएस का खर्च का अनुमान भारत के 2014 के संसदीय चुनाव के 5 अरब डॉलर के मुकाबले 40 फीसदी अधिक है और यह आंकड़ा प्रति वोटर लगभग 8 डॉलर का बैठता है। उल्लेखनीय है कि भारत की 60 फीसदी जनता रोजाना करीब 3 डॉलर की आमदनी पर गुजर-बसर करती है। इतनी बड़ी धनराशि खर्च करने के नाते ही सोशल मीडिया प्रबंधन करने वाली कंपनियों से राजनेता जीत की उम्मीद लगाए बैठे हैं। भले ही लाइक खरीदा जा रहा हो प्रमोशन में पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे हों। सोशल मीडिया फेक एकाउंट की मंडी नजर आ रहा हो। देश के प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री और नामचीन लोगों के नाम से फेक एकाउंट बने हों। पैरोडी एकाउंट चल रहे हों। इस आभासी दुनिया में अपनी शोहरत हासिल करने के लिए लाखों करोड़ों रुपए की डील देखा जा सकती है। गुमराह करने वाले इन एकाउंट्स में रेट फॉलोअर की संख्या के हिसाब से तय होते हैं। इसके लिए रीच माडल पर भी गौर फरमाया जाता है। गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियां भी इससे परेशान हैं। यह उनका कहना है। फेक न्यूज रोकने के लिए फेसबुक ने तो भारत के लगभग सभी प्रमुख अखबारों में फुल पेज का विज्ञापन देकर लोगों से राय मांगी पर फेसबुक यह नहीं कर सका कि कोई भी सूचना जिस नंबर से जनरेट होती है वह नंबर सूचना के साथ इस कदर टैग हो कि आभासी दुनिया में फेक न्यूज का खेल खेलने वाले पकड़े जा सकें। दरअसल गूगल और फेसबुक की चिंताएं महज कागजी हैं। क्योंकि इनकी आमदनी का भंडार ही फेक न्यूज के भंडार से चलता है। गलत खबरों, एक दूसरे पर कीचड़ उछालने वाली खबरों, इतिहास को तोड़मरोड़ कर पेश करने वाली खबरें ही आमदनी का जरिया होती हैं।

जब खबरों का सोर्स प्रेस कांफ्रेंस की जगह ट्विट हो गया हो तब सोशल मीडिया पर सबका केंद्रीकरण हो जाना गैर वाजिब नहीं है। लेकिन घंटों इस पर गुजारने वालों को अगर कोई फायदा नहीं पहुंचता है तो आखिर इस सोशल मीडिया के संसार का विस्तार कैसे होगा। यूट्यूब, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, गूगल आमदनी का भी जरिया हैं। जिनके पास कापीराइट के उल्लंघन को पकड़ने का टूल है, जिसके मार्फत वह समय समय पर साइट बंद करने के फैसले लेते रहे हैं, वह अगर यह कहें कि आभासी दुनिया के असत्य और अप्रिय पर नियंत्रण उनके बस का नहीं है तो मतलब साफ है कि वे लगाम की बात ऊपरी मन से कह रहे हैं।