सैर पर जायें, देश बनायें

सैर पर जायें, देश बनायें

ख्वाजा मीर दर्द ने लिखा है- “सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहां…।”

ये लाइनें बीते 15 अगस्त को लाल किले से घरेलू पर्यटन को मजबूत करने के लिए देश में कम से कम दस स्थानों पर हर साल अपने परिवार के साथ जाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील से मेल खाती हैं। यह अपील बेवजह नहीं है। हमारे अंदर विदेशी यात्राओं को लेकर बढ़ते आकर्षण से उपजी चिंता का सबब है। जब हमें बाहर की दुनिया पराई और अपनी पहुंच से दूर नहीं लगती, तब अपने देश के पर्यटन ठिकानों के प्रति उपेक्षा या हिकारत के भाव पर किसी भी राजनेता का चिंतित होना स्वाभाविक है। पर्यटन एक ऐसी यात्रा है जो मनोरंजन या फुर्सत के क्षणों का आनंद उठाने के उद्देश्य से की जाती है। यह आलोक देती है। सिर्फ आनंद नहीं देतीं। चार्ज भी करती हैं। बौद्ध, जैन और हिन्दू में ही नहीं, यहूदी और इसाई धर्म में भी घूमने का बड़ा पाजिटिव शास्त्र उपलब्ध है।

धर्म नायकों के लिए वर्षा के तीन माह छोड़कर एक जगह रहना पाप माना जाता है। शंकराचार्य ने भी देश के चार कोनों में चार पीठ स्थापित की। धार्मिक पर्यटन का यह बेजोड़ नमूना है। इन पीठों के मार्फत उत्तर और दक्षिण को जोड़ा गया है। उत्तर भारत की पीठों में दक्षिण के पुजारी हैं। दक्षिण की पीठों में उत्तर भारत के पुजारी हैं। भगवान महाबीर आजीवन घूमते रहे। गुरु नानक अपने समय के महान घुमक्कड़ थे। शंकराचार्य को महान बनाने वाली उनकी घुमक्कड़ी आदत ही थी। बुद्ध भी घूमते ही रहे। शिष्यों को कहा- ’चरथ, भिक्खावे। यानी भिक्षुओं घुमक्कड़ी करो।‘ पर्यटन शब्द का पहला प्रयोग 1811 में और पर्यटक शब्द 1840 में पहली बार इस्तेमाल हुआ। जीडीपी में 6.2 और रोजगार में 8.78 फीसदी पर्यटन का योगदान है।

सवाल यह है कि इतनी संभावनाओं के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लालकिले से भारत के लोगों से घरेलू पर्यटन के लिए आगे आने की अपील क्यों करनी पड़ी? रिजर्व बैंक के ताजे आंकड़े इसका जवाब देते हैं- इस साल जून महीने में भारत के लोगों ने 59.6 करोड़ डॉलर की धनराशि विदेश यात्रा पर खर्च की है, जो तकरीबन चार हजार करोड़ रुपये बैठती है। पिछले साल इसी महीने के आंकड़ों के हिसाब से यह खर्च डेढ़ गुना अधिक है।

वर्ल्ड टूरिज्म आर्गनाइजेशन के आंकड़े बताते हैं कि 2017 में विदेश जाने वाले भारतीयों की संख्या 2.4 करोड़ थी। 2019 में इसके पांच करोड़ होने की उम्मीद है। जिस समाज में यह मान्यता रही हो कि समुद्र के खारे पानी और हिन्दू धर्म में बड़ा बैर है। वहां ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं। हकीकत है कि विदेश यात्राओं का चलन जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उसी अनुपात में घरेलू पर्यटन ठिकानों की ओर से पर्यटक मुंह फेर रहे हैं। शानदार प्राकृतिक दृश्य और मुकाम उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। कोलंबस और वास्को द गामा की घुमक्कड़ी ने पश्चिमी देशों के आगे बढ़ने के मार्ग खोले। आर्य, शक, हूण ने घुमक्कड़ी के चलते ही दुनिया में पैर पसारे। पर्यटकों को लुभाने के लिए भारत सरकार ने अतुल्य भारत योजना शुरू की। ऐसे में हमारे लिए जरूरी हो जाता है कि हम अपनी जगहों को दुनिया के देखने लायक कैसे बनाएं।

अपनी जगहों को देखे बिना दुनिया को बता पाने में हम कामयाब नहीं हो सकते। यह भी नहीं भूलें कि पुस्तकें घुमक्कड़ी का कुछ-कुछ ही रस प्रदान कर सकती हैं। क्योंकि हकीकत यह है कि यात्रा कथाओं और फोटो देखकर हिमालय के देवदार के गहन वन और श्वेत हिम मुकुटित शिखरों के सौंदर्य, रूप, गंध का अनुभव नहीं किया जा सकता है। इसके लिए हमें देश के रमणीक स्थलों पर जाना ही होगा। हमारे यहां भी अपार सौंदर्य भरा पड़ा है। पश्चिम की तरह हमने अपने सौंदर्य को गढ़ा नहीं है। हमारे सौंदर्य नैसर्गिक और अल्हड़ रूप में हैं। हमारे देश की विविधता भी एक बड़ा सौंदर्य है। एक ही समय चार डिग्री और 34 डिग्री के तापमान जिए जा सकते हैं। वादियां, घाटियां, पहाड़, झील, झरने, स्थापत्य, पुरातत्व अपनी समृद्धि के साथ बिखरे पड़े हैं।

पर्यटन का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि साहित्य में यात्रा वृत्तांत का अलग संदर्भ है। कई लेखकों ने यात्रा वृत्तांत की अमर कृतियां रची हैं। यात्रा वृत्तांत को लेकर अमर कृतियां लिखने वालों में राहुल सांकृत्यायन का नाम आता है। उनका एक बड़ा महत्वपूर्ण लेख है- अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा। जिसका अर्थ होता है कि जिस किसी व्यक्ति में जिज्ञासा बहुत हो उसे अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए घूमना चाहिए। घुमक्कड़ी की दुनिया में अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा ध्येय वाक्य की तरह लिया जाता है। घुमक्कड़ी का धर्म में जिक्र का सवाल हो या फिर साहित्य में। यह सब बीसवीं शताब्दी में ही उत्कर्ष को प्राप्त कर चुके थे। तब संचार, यातायात और प्रवास की सुविधाएं आज सरीखी नहीं थीं। आज इन सुविधाओं में चार चांद लग गए हैं। ऑन लाइन सब कुछ उपलब्ध है। ऐसे में हमारी यह जिम्मेदारी हो जाती है कि हम अपने और परिवार की घुमक्कड़ी की आदत को भी चार चांद लगाएं।

कभी महसूस करना हो खुद को, तो अच्छा होता है, यात्रा पर निकल पड़ना। यात्राएं देती हैं वर्तमान में जीने का सुख। अतीत और भविष्य के बीच बनती हैं कड़ी। जो वर्तमान है वह पलक झपकते अतीत हो जाता है। चाहे ट्रेन की खिड़की के पास बैठकर बाहर निहारने के क्षंण हों या गाड़ी की विंडस्क्रीन से सब कुछ देखते जाने का समय। यात्रा जरूरी है हर हालत में। यात्रा में निरंतर बदलते हैं- दृश्य चित के, मन के, आमने-सामने के, आसपास के, वर्तमान और भविष्य के। कभी नीला आसमान काला-सफ़ेद, कभी काले घने बादलों की दौड़, कभी उसका सूरज पर डेरा, सूर्य को घेरा, कभी समंदर की अथाह गहराई में उतरने की साहसिक शुरुआत। ये सभी पड़ाव हैं, यात्राओं के। समय के पहिए और सड़क के बीच उभरती धुन या राग के साथ अगर देखना है खुद को अनुभवों के नये द्वार पर तो करनी होंगी-यात्राएं। यहां से वहां की, वहां से जाने कहां-कहां की। क्योंकि यात्राएं पल-पल बदलाव की इबारते हैं। यह बदलाव बनाये रखता है तरोताज़ा। क्योंकि नित बदलते जाना प्रकृति भी है। प्रकृति बस महज़ इसीलिए बूढ़ी नहीं होती क्योंकि वह खुद को निरंतर बदलती रहती है।