गठबंधन शह से कर सकता है भाजपा को परेशान

गठबंधन शह से कर सकता है भाजपा को परेशान
 
दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। राजनीति में स्थाई शत्रु और स्थाई मित्र नहीं होते। 12 जनवरी, 2019 को 12 बजकर चार मिनट पर लखनऊ के पांच सितारा होटल में इन दोनों कहावतों को सच होते देखा गया। 2 जून, 1995 को हुए गेस्ट हाउस कांड के चलते एक दूसरे के धुर शत्रु सपा और बसपा ने गलबहियां कर लीं। मायावती को देशहित और जनहित इस कांड से ज्यादा जरूरी लगे। बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इन दोनों दलों को हाशिये पर पहुंचा दिया था। दोनों ने ‘आल टाइम लो परफार्म‘ किया। दोनों के सामने अस्तित्व का संकट आ गया। भाजपा अगले लोकसभा चुनाव में जिस तरह की तैयारी से उतरने के लिए कमर कस रही थी, उससे यह संदेश आसानी से पढ़ा जा रहा था कि इस बार फिर सपा और बसपा ‘आल टाइम लो‘ के अपने रिकार्ड से ऊपर नहीं आ पाएंगे। अखिलेश की पहल पर तैयार हुई गठबंधन की नींव में मायावती और अखिलेश दोनों ने मन की गांठें खोलीं।
दस साल तक सत्ता से लगातार बाहर रहने वाला दल खत्म हो जाता है। क्योंकि सत्ता से ही राजनेता और उसके दल को संजीवनी मिलती हैै। 2003 में मुलायम सिंह ने बसपा को तोड़कर सरकार सिर्फ इसीलिए बनाई क्योंकि उन्हें सत्ता से बाहर रहते लंबा काल खंड हो गया था। इस सरकार ने सपा को संजीवनी दी। दो उपचुनाव में सपा और बसपा की जोड़ी ने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के गढ़ में जीत का परचम फहरा कर बता दिया कि सोशल इंजीनियरिंग का उनका फार्मूला फिट ही नहीं हिट भी है।
1992 में मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी बनाई। 1993 में भाजपा का रास्ता रोकने के लिए बसपा के साथ रणनीतिक साझेदारी की। सपा 256 और बसपा 164 सीटों पर लड़ी। सपा को 17.94 बसपा को 11.12 फीसदी वोट क्रमशः 109 तथा 67 सीटंे मिलीं। भाजपा को 33.30 फीसदी वोटों के साथ 177 सीटें हाथ लगीं। कल्याण सिंह की मौजूदगी के चलते सपा और बसपा गठबंधन को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का साथ लेना पड़ा। भाजपा ने भी अच्छा प्रदर्शन किया था। क्योंकि मंडल और कमंडल दोनों ताकतों का प्रतिनिधित्व करने वाला कल्याण सिंह सरीखा नेता था। इस चुनाव में मुलायम और कांशीराम ने नारा दिया था- ‘‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में हो गये जयश्रीराम।‘‘ लेकिन 2 जून, 1995 को गेस्ट हाउस कांड के बाद भाजपा ने बसपा की सरकार बनवा दी। सवर्ण जातियों से अधिक यादव और दलितों में बैर हो गया। जो इस हद तक पहुंचा कि सपा की सरकार होने की पर दलित नौकरशाह और मतदाता हाशिये पर रहते थे। मायावती की सरकार होने पर कमोवेश यही स्थिति यादवों की होती थी। यह खाई बीते 25 सालों में गहरी होती गई। इसीलिए दोनों अपना वोट ट्रांसफर करा पायेंगे। यह सवाल हो गया है।
परन्तु 2017 में भाजपा सरकार आने के बाद ही यादव और दलित मुख्यधारा में नहीं आ पाये। नतीजतन, उनके मन में भी भाजपा के प्रति बैर-बैर की धारणा हो गई। बीते दिनों ओबीसी की कई जातियों का सम्मेलन कर जो समां भाजपा ने बांधा गठबंधन ने उसकी हवा निकालकर रख दी। क्योंकि दोनों दलों के पास ओबीसी के बड़े इलाकाई नेता हैं।
संवाददाता सम्मेलन में पहले अपनी बात रखते हुए मायावती ने उनसे और अखिलेश यादव से पूछे जाने वाले संभावित सभी सवालों के जवाब दिये। शिवपाल सिंह यादव को भाजपा का एजेंट और खनन घोटाले में सीबीआई जांच पर बिफरीं। अखिलेश राज में हुए खनन पट्टों की सीबीआई जांच के आदेश हाईकोर्ट ने दिये। जिसमें अखिलेश के पसंदीदा एक दर्जन आईएएस अफसरों के फंसने की उम्मीद है। दो महिला आईएएस अफसरों के घरों में तलाशी हो चुकी है। मायावती को भी आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई झेलनी पड़ी थी। मायावती तीन बार भाजपा के साथ सरकार बना चुकी हैं। गुजरात में नरेंद्र मोदी का प्रचार कर चुकी हैं।
यह संयोग नहीं है कि मुलायम सिंह ने पहली बार अपनी सरकार कांग्रेस की मदद से बनाई। जब भी उन्हें जरूरत पड़ी तो कांग्रेस सपा के साथ खड़ी मिली। आज सपा ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया, वह भी तब जब ‘‘27 साल यूपी बेहाल‘‘ के नारे से बीते विधानसभा चुनाव में अकेले चुनावी शुरुआत करने वाली कांग्रेस ने ‘यू-टर्न‘ करके सपा से गठबंधन किया। नतीजतन, अखिलेश सरकार के अपयश की वह सहभागी बनी। कांग्रेस को भी ‘आलटाइम लो‘ सिर्फ आठ सीटें मिलीं। सपा को 47 और बसपा को 19 सीटें हाथ लगीं। भाजपा को 39 फीसदी वोट और 312 एमएलए मिले। बीते लोकसभा चुनाव में बसपा 19.60 फीसदी वोट पाई पर खाता खाता नहीं खुला। 22 फीसदी वोट पाने वाली सपा पांच सीट पाई। भाजपा को 42.30 फीसदी वोट और 71 सीटें हाथ लगीं।
राजनीति में दो और दो चार नहीं होते, ठीक से लिखा जाए तो 22 भी हो सकते हैं। एक-दूसरे चुनाव के फार्मूले में कोई मेल नहीं होता। लेकिन हर राजनीतिक दल का एक ‘बॉटम लाइन‘ होता है। भाजपा को पराजित करने के लिए एकजुट हुई सपा और बसपा की ‘बॉटम लाइन‘ इस लायक नहीं है। वोटों के ध्रुवीकरण के लिए गठबंधन में कांग्रेस का होना अनिवार्य था। यूपी में कांग्रेस को 2012 में 11.65, 2014 में 7.53 और 2017 में छह फीसदी वोट मिले थे। सपा और बसपा चाहे जितनी सीटें पा जाएं पर उनका नेता प्रधानमंत्री नहीं हो सकता। तभी तो मायावती को प्रधानमंत्री के लिए समर्थन के बाबत पूछे गए सवाल पर अखिलेश ने कहा कि आप जानते हैं मैं किसका समर्थन करूंगा। यूपी ने हमेशा प्रधानमंत्री दिया है, हमें खुशी होगी कि यूपी एक बार फिर प्रधानमंत्री दें।
 राजनीति जो शक्ल अख्तियार कर रही हैं उसमें नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी ही अखिल भारतीय स्तर की छवि वाले नेता है। नतीजतन, कांग्रेस को बाहर रखना मायावती के उस बयान की हवा निकाल देता है, जिसमें वह गठबंधन को गुरु चेले की नींद उड़ाने वाला बताती हैं। उनका संकेत अमित शाह और नरेंद्र मोदी से था। राजनीति में टोटकों का महत्व है, इसी पांच सितारा होटल में अखिलेश और राहुल ने गठबंधन का एलान किया था। परिणाम निराशाजनक आये। 15 जनवरी मायावती और डिंपल दोनों का जन्मदिन है। पहली बार डॉ. राममनोहर लोहिया का नाम लेकर मायावती ने कांशीराम के सत्ता की चाभी अपनी जेब में रखने के राजनीतिक फार्मूले का जिक्र कर गठबंधन की मंशा बताई। पर चाभी दोनों में से किसकी जेब में होगी? यह सवाल दोनों दलों के कार्यकर्ताओं और छोटे नेताओं को चुनाव तक समझा पाने में मायावती और अखिलेश कितना कामयाब होते हैं, इसी पर गठबंधन का परिणाम निर्भर है। क्योंकि कांग्रेस को बाहर रखकर वोटों के ध्रुवीकरण से गठबंधन चूक गया।
जब राहुल गांधी का अभ्युदय हो रहा हो, चार राज्यों में उनकी सरकार बन चुकी हो। नरेंद्र मोदी के निशाने पर सिर्फ राहुल गांधी हों तो भाजपा के खिलाफ वोट देने का मन बनाए लोगों का विकल्प राहुल क्यों नहीं बनेंगे? गठबंधन के विजय की उम्मीद ‘कास्ट केमिस्ट्री‘ है। मोदी अगर लोकसभा चुनाव को जातियों के खांचे से बाहर लाने में कामयाब हो गए तो गठबंधन का असर, बेअसर हो सकता है। लेकिन उत्तर प्रदेश की भाजपा से यह उम्मीद नहीं की जा सकती। क्योंकि वह जातीय सम्मेलन करके बहुसंख्यकों का राजनीतिक संरक्षक बताने की जगह जातिवादी हो गई है। उसकी प्रदेश सरकार ने भी जनता को बेहद निराश किया है। ऐसे में पिछली बार के 73 के आंकड़े को दोहराना भाजपा के लिए असंभव होगा। गठबंधन ने अपने बूते पर 282 यानि स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा खड़ा करने के भाजपाई मंसूबों पर पलीता लगा दिया है। गठबंधन भाजपा के संकल्प और सपनों को आकार नहीं लेने देगा। भाजपा, सपा-बसपा के दो और दो के समीकरण को चार से ऊपर निकलने से रोकने में कामयाब होगी।