ये कहां जा रहे हैं हम

ये कहां जा रहे हैं हम


अमेरिकी राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा ने जब अपनी भारत यात्रा के समय विजिटर बुक में भारत को सबसे बड़ा और अमेरिका को सबसे पुराना लोकतंत्र लिखा था तब बहुत से लोगों को इस बात पर आपत्ति थी कि अमेरिका सबसे पुराना लोकतंत्र कैसे हो सकता है? हमारे देश में छठीं शताब्दी ईस्वी पूर्व गणराज्य थे। ऐसे में हम ही सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्र हैं। लेकिन आज जब देश में 17वीं लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं तब जो परिदृश्य दिखाई पड़ रहा है वह सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्र के दावे के लिहाज से बेहद निराश करने वाला है। किसी भी दल का ऐसा नेता नहीं है जिसे मुंह बंद करने की हिदायत चुनाव आयोग को न देनी पड़ी हो। हर नेता की जुबान इतनी लंबी हो गई है कि जमीन छू रही है। पहले नेता चुनावी दौरे पर होता था तो खाली हाथ। लेकिन जब लौटता था तो जनता अपनी गाढ़ी कमाई उसे चुनाव लड़ने के लिए थमा देती थी। आज नेता गाड़ियों में रुपया ठूंस कर चुनावी दौरे पर निकलते हैं। चुनावी मौसम में शराब की खपत दूध से ज्यादा हो जाती है। हर उस चीज की बिक्री आसमान छूने लगती है जो बिगड़ने, बिगाड़ने के काम आती है।

 चुनाव में लोग आकांक्षी हो उठते हैं पर अपने अतीत से छुटकारा चाहते हैं। चुनावी प्रक्रिया बेहद बदत्तर और खर्चीली है। रोड शो चुनावी अभियान का घातक गुप्त मंत्र है। पहले दौरे चुनाव आलोचक सिर्फ राजनीतिक होते थे। लेकिन आज इनके तमाम रूप हैं। राजनीतिक, सामाजिक। एक जेनेटिकल विरोधियों की भी जमात पैदा हो गई है। वोट के गणितीय प्रमेय भौतिकवादी हो गए हैं। सत्य नहीं, अपनी बातों को पुष्ट करने का आधार तर्क हो गया है। तभी तो पिछड़ी जातियों की तादाद बढ़ा-चढ़ा कर बताई जा रही है। जिस भी पिछड़ी जाति के नेता से मिलिये वह यह कहता नहीं थकता है कि 54 से 60 फीसदी लोग उसकी जाति जमात के हैं। अगर इसे सच मान लिया जाए तो अकेले उत्तर प्रदेश के पैमाने पर 18.5 फीसदी मुस्लिम, तकरीबन 22 फीसदी अनुसूचित जाति और जनजाति इनके अलावा हैं। इस तरह 94 फीसदी यही हो जाते हैं। अगड़ों के लिए सिर्फ छह फीसदी बचता है। निसंदेह यह आधारहीन है। डॉ. मनोहर लोहिया कहा करते थे पिछड़े पावे सौ में साठ। पर उनके पिछड़ों में मुस्लिम, सवर्ण, दलित और पिछड़े समाज की महिलाएं भी थीं। आज के आरक्षण प्रेमी लोहिया के चेले इसका भाष्य नहीं कर पा रहे हैं।

 नेता और मतदाता दोनों की सार्वजनिक स्मृति लोप हो रही है। सार्वजनिक दायित्व नेपथ्य में चला गया है। सफलता राजनीतिक आकांक्षाओं और जातियों की मजबूत पकड़ का मिश्रण हो गया है। पहले सिर्फ हिंदू-मुसलमान था यह करने में अंग्रेजों को सौ साल लगे थे। लेकिन हमारे नेताओं ने 72 साल में अगड़ा, पिछड़ा किया। ओबीसी में ईवीसी यानी अत्यन्त पिछड़ी जातियों का बंटवारा किया। अगड़ों में आर्थिक रूप से कमजोर का धड़ा बनाया। आरक्षण का औजार इसमें बहुत काम आया। 56 करोड़ सोशल मीडिया वारियर की कुछ भी लिखने की स्वतंत्रता सिर्फ पीड़ा का सबब बनकर रह जाती है। 

1957 में अटल बिहारी वाजपेयी बलरामपुर से चुनाव लड़ रहे थे। उनके सामने कांग्रेस से सुभद्रा जोशी थीं। पं. जवाहरलाल नेहरू गोंडा से चुनाव लड़ रहे दिनेश प्रताप सिंह के चुनाव प्रचार में आये थे। उनसे आग्रह किया गया कि बलरामपुर प्रचार करने चलें। पर नेहरू ने कहा कि वह अटल के खिलाफ प्रचार करने नहीं जाएंगे। पं. दीनदयाल उपाध्याय जौनपुर से चुनाव लड़ रहे थे। डॉ. राममनोहर लोहिया कन्नौज से। लोहिया, दीनदयाल के चुनाव प्रचार में बहुत मना करने के बाद भी गये। दीनदयाल का जौनपुर संसदीय क्षेत्र में खुद को ब्राह्मण कहलाना हार जाने से ज्यादा नागवार गुजरा। नेहरू मिथक और सत्य किताब के मुताबिक 26 नवंबर, 1951 में तिरुवनंतपुरम में नेहरू ने एक रैली में कहा, ‘‘मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि कांग्रेस के पास आगे का मिशन है। हालांकि कांग्रेस यहां, वहां गलत कामों में पड़ गई है। स्थानीय गुटों में बंट गई है। जिसने इसे कमजोर किया है। कांग्रेस या किसी संगठन के लिए यह बहुत खराब होगा कि उसके सामने कोई नहीं है। इसलिए हर हाल में विपक्ष होना चाहिए।‘‘ अब इस तरह सोचने वाले नेताओं की जाति ही नहीं है। अब तो सियासत सिर्फ कुर्सी के लिए होती है। कुर्सी पाने के लिए कुछ भी फेक या फाउल नहीं है। बूथ कैपचरिंग का पहला मामला बेंगूसराय के रचियाही में मटिहानी विधानसभा सीट पर सरयुग प्रसाद सिंह के पक्ष में देखने को मिला। 

 लोकसभा से ज्यादा अच्छा चुनाव प्रधानी का होता है। पंचायत के चुनाव ने गांव का फैब्रिक बिगाड़ दिया है। यह तब है जब पंचायत के चुनाव लोकसभा से अच्छे होते हैं। फिर आखिर लोकसभा चुनाव सोशल फैब्रिक पर क्या और कितना असरगामी होते होंगे? कोई भी ऐसा दल नहीं है जिसमें परिवारवाद और वंशवाद की बेल फलफूल न रही हो। आज राजनेता की कथनी और करनी में विरोधाभास है। सियासत, विरासत की चेरी हो गई है। आयातित उम्मीदवारों के बिना किसी भी दल में अपने लिए मजबूत उम्मीदवार जुटा पाना असंभव हो गया है। राजनीतिक पार्टियां हित साधन में जुटी हैं। राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रेम के मायने बदल गये हैं। शब्दों ने अपने अर्थ खो दिये हैं। नेता सबसे बड़ा अभिनेता बन बैठा है। चुनाव में जो कुछ भी हो रहा है ऐसा नहीं कि उसके लिये हर शख्स जिम्मेदार न हो। कुछ कम, कुछ ज्यादा। अब तो कम जिम्मेदार, ज्यादा जिम्मेदार की तरफ उंगली उठा रहा है। जब कोई अभिजात्य विकास क्रम अपने स्वर्णिम अतीत के विराट चिंहों को बर्बाद कर अपना तथाकथित मेकअप कर रहा होता है तब प्रायः ऐसा होता है। लेकिन इसी के साथ वह अपने सुंदरता में दिखाई देने वाली कुरूपता के बदसूरत प्रतिमान भी गढ़ रहा होता है। 

एडीआर नामक संस्था ने इस बार के लोकसभा चुनाव के उम्मीदवारों का एक विश्लेषण किया है। जिसके मुताबिक इस बार करोड़पति उम्मीदवार सबसे ज्यादा मैदान में है। चालीस फीसदी ऐसे उम्मीदवार हैं चौथी से बारहवीं तक पढ़े हैं। धनबल और बाहुबल से किसी भी दल ने परहेज नहीं किया है। मतदाताओं ने भी मिजाज खराब कर रखा है। वे ‘डायरेक्ट बेनिफिट‘ के आदि हो गये हैं। लाभ चुनाव का मूलमंत्र हो गया है। लाभ, लोभ को आमंत्रण दे रहा है। लोभ किसी तंत्र के लिए घातक है। लोकतंत्र के लिए और घातक है। पर इस घातक का अंत करने को कोई- नेता, मतदाता, चुनावी मशीनरी, सरकारी तंत्र, राजनीतिक दल आमादा नहीं है।