ताशीए सतपाल सरीखे हीरो को भी नमन

ताशीए सतपाल सरीखे हीरो को भी नमन

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा।

वर्ष 1916 में जगदम्बा प्रसाद मिश्र हितैषी ने शहीदों की शहादत को नमन करते हुए यह गौरव गाथा लिखी थी। कारगिल विजय के बीसवें साल में जिस तरह समूचे देश ने कारगिल में शहीद हुए 527 जाबांज जवानों को याद किया। 1363 घायल जवानों के प्रति सिर झुका कर श्रद्धा जताई उससे जगदंबा मिश्र की कविता की लाइनें प्रासंगिक ही नहीं सुर्ख हो उठी। हमारे शहीदों के परिजनों को हौसला मिला। उन लोगों को भी हौसला मिला जो भारत मां की रक्षा के लिए अपने लाडलों को विदा करते हैं। भेजते हैं।

कारगिल में पाकिस्तान ने धोखा धड़ी की थी। पाकिस्तानी घुसपैठिये कारगिल पहाड़ियों पर तो काबिज हो ही गए थे। भारतीय सीमा के दस किलोमीटर तक पाकिस्तानी फौजों ने घुसपैठ कर ली थी। भारतीय सैनिकों द्वारा जाड़ों में खाली कर दिये जाने वाले कारगिल पहाड़ियों पर पाकिस्तानी सेना के कब्जे का ब्लू प्रिंट मुशर्रफ ने ही तैयार किया थाए यह पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और अटल बिहारी वाजपेयी की टेलीफोनिक बातचीत में साफ भी हुई थीए जब अटल बिहारी वाजपेयी ने फोन करके नवाज शरीफ से इस षडयंत्र के बारे में कहा तो नवाज शरीफ का साफ सा उत्तर था कि उन्हें नहीं पता हैए परवेज मुशर्रफ से पूछ कर बताएंगे। इस विजय में बोफोर्स तोपों ने बेहद अहम भूमिका निभाई। कारगिल विजय पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष रहे परवेज मुशर्रफ के मंसूबों का मुंहतोड़ जवाब थी। परवेज बाद में पाकिस्तान के सात साल तक राष्ट्राध्यक्ष भी रहे। लेकिन कारगिल में जिस तरह भारतीय सैनिकों ने 59 दिन तक चले युद्ध में पाकिस्तान के हौसले तोड़ेए उससे राष्ट्राध्यक्ष रहने के दौरान मुशर्रफ भारत की तरफ देखने की हिमाकत नहीं कर सके।

कारगिल विजय का जितना श्रेय हमारे शहीदों कोए सेना को है उतना ही श्रेय उस चरवाहे ताशी नामग्याल को भी जाता हैए जिसने अपने गायब हुए याक को कारगिल पहाड़ी में तलाशते समय शिखर पर कुछ संदिग्ध लोगों को देखा और सेना की इलाकाई टुकड़ी को इत्तिला दी। ताशी गारकौन गांव का रहने वाला हैए जो कारगिल से साठ किलोमीटर दूर है। ताशी शहीद नहीं हुआ। लेकिन उसका काम कम हौसलामंद नहीं कहा जाएगा। ताशी के चार बच्चे हैं। केवल एक बच्चे की पढ़ाई में सरकारी मदद उसे मिली। जो उससे वायदे किये गए थेए कुछ भी पूरे नहीं हुए। ताशी को सजगता और बहादुरी के लिए बहुत सम्मान मिले। लेकिन आज उसे कोई पूछने वाला नहीं है। उसे इस बात पर अफसोस भी है कि उसे क्या मिलाए कुछ तो मिलना चाहिए था। ताशी ही नहीं गारकौन गांव के लोगों को भी गांव में विकास की गंगा बहने की उम्मीद थी। लेकिन हुआ कुछ नहीं।

ताशी ने अगर कारगिल पहाड़ियों पर घुसपैठ की सूचना नहीं दी होती तो हमारे लिए विजय उत्सव मनाना आसान नहीं होता। ताशी भी हमारा एक हीरो है। हमें इस हीरो का भी ख्याल रखना चाहिए। ताशी की तरह ही कारगिल युद्ध के एक हीरो सतपाल सिंह भी उपेक्षा के शिकार हैं। सतपाल सिंह उन लोगों में हैं जिन्होंने पाकिस्तानी सेना के कैप्टेन कर्नल शेर खां को मौत की नींद सुला दिया। सतपाल द्रास सेक्टर में तैनात थे। युद्ध के दौरान वह घायल हो गए थे। लेकिन भारतीय सेना के लिए कहर बने कैप्टेन शेर खां और तीन अन्य को घायल अवस्था में ही अपनी बंदूक की गोली से मौत के घाट उतार दिया। कारगिल विजय गाथा का एक अध्याय सतपाल सिंह से भी बनता है। क्योंकि शेर खां के मारे जाने से पाकिस्तानी टुकड़ी के हौसले पस्त हो गए। पटियाला जिले के फतेहपुर गांव के सतपाल को वीर चक्र से सम्मानित किया गयाए जबकि जिस कैप्टेन कर्नल शेर खां को सतपाल की गोली ने मौत की नींद सुलाया उसे भारतीय सेना की संस्तुति पर पाकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान निशान.ए.हैदर मिला। सेना से रिटायर होने के बाद सतपाल सिंह के पास जिंदगी जीने के लिए पुलिस में शामिल होने के अलावा कोई रास्ता न था। सतपाल पंजाब के भवानीगढ़ कस्बे के चौक पर ट्रैफिक सम्हालने का काम करते हैं हालांकि इनकी वर्दी पर लगे मेडल इन्हें पंजाब पुलिस से अलग पहचान दिलाते हैं।

सतपाल के पिता भी सेना में थे। सतपाल को रंज है कि पंजाब पुलिस में भर्ती के लिए भूतपूर्व सैनिकों का 13 फीसदी ही कोटा हैए इसे बढ़ाया जाना चाहिए। फिलहाल वह अपनी दो बेटियों और बेटे के साथ पटियाला में रहते हैं। सतपाल का एमबीए पास बेटा बेरोजगारी काट रहा है। बहादुर जवानों के बच्चों के बारे में सरकार की अनदेखी का भी मलाल सतपाल को है। कारगिल के बीसवें साल पर जब सतपाल ट्रैफिक का काम संभाल रहे थे तो उनकी फोटो मीडिया में साया हुई। तब जाकर पंजाब के मुख्यमंत्री की नींद टूटी और उन्होंने एक साथ दो प्रोन्नति सतपाल को दी। हम सतपाल सिंह और ताशी जैसे अपने हीरो को वह सम्मान नहीं दे पाए जिसके वे हकदार हैं। ऐसे तमाम हीरो हमारे आसपास पसरे हैं।

सवाल यह है कि हमारे हीरो कब तक याचना की मुद्रा में खड़े रहेंगेघ् क्यों उन्हें याचना की मुद्रा में आना चाहिएघ् क्यों नहीं सरकार और समाज को आगे बढ़कर उन्हें इतना कुछ दे देना चाहिए ताकि अन्य लोग ऐसे हीरो बनने के लिए आगे आएंघ् किसी भी देश का इतिहास वर्तमान और भविष्य इसी तरह के हीरो से ही सुरक्षित रहता है। शौर्यए पराक्रम और वीरता की गाथा इनकी भी देखीए सुनीए पढ़ी जाती है।
आइए अपने आसपास जो भी ऐसे हीरो हों उन्हें तलाशें। उनके परिजनों से मिलें। उनकी जरूरत में हिस्सेदार बनें। उनके सम्मान में चार चांद लगाने की कोशिश करें। तभी हीरो बनने और बने रहने का अंतहीन सिलसिला चलता रहेगा और वतन पर मरने वालों की कतार टूटने का नाम नहीं लेगी। जो चला जाएगा वह शौर्य और पराक्रम का प्रतीक हो जाएगा। जो उसके आश्रित रह जाएं। उन्हें भी गौरव का अहसास कराने की जरूरत है। उन्हें मौके.बेमौके याद करने की रस्म अदायगी तक ही सीमित न रहा जाए।